Maybe We'll Talk, Aaram Se
How many times have you thought of calling someone and then told yourself, “Not now. I’m busy. We’ll talk later, aaram se.” How many times you wanted to ask someone, “How are you feeling now?” but told yourself, “We’ll talk aaram se,” because you didn’t have the time for the conversation that might follow? How often have you delayed telling someone something that has been sitting in your heart for days, thinking, “Maybe I’ll talk aaram se, when I’m in the right frame of mind”
Preeti Hans
Sep 243 min read
The Misery Olympics
Have you ever felt that people around us—or perhaps even we ourselves—are always in a race to prove that our lives are more difficult than someone else’s? The moment you tell someone, “You know, I have this problem,” pat comes the reply, “Arrey, this is nothing. Look at me. I have this problem and that problem… and so many more.” Why do we do this? Are we trying to glorify having more problems than the other person? Have we somehow turned suffering into a Misery Olympics, whe

Preeti Hans
Sep 223 min read
जलवा
मास्टर जी जैसे ही क्लास के सामने पहुँचे, वे अचंभित! उन्होंने जो देखा और जो महसूस किया उसका पूरा वर्णन शब्दों में समा पाएगा ऐसा लग नहीं रहा। यहाँ आपकी कल्पनाशक्ति ही आपके काम आएगी। खैर! कोशिश करता हूँ आपकी कल्पना को आधार देने की। घटना बताता हूँ। मास्टर जी वैसे तो रोज ही आकर्षक वस्त्र धारण करके तथा काला चश्मा लगाकर मदमस्त अंदाज़ में आया करते थे। पर वह दिन कुछ विशेष था। उनका चेहरा कुछ विशेष रूप से खिला हुआ था। सूट–बूट भी कुछ नया–सा लग रहा था। पर उनके चेहरे को और खिला देने का इं

Avinash Jha
Sep 175 min read
गधा
अपने 11 वर्ष की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते न जाने कई बार उसने लोगों के मुँह से अपने लिए ‘गधा’ संबोधन सुना होगा। ‘ओए गधे! सुनता नहीं है।’ ‘गधे! तुमसे नहीं होगा।’ ‘गधा कहीं का! तुझे इतनी सी बात समझ नहीं आती!’ एक दिन अचानक उसे क्या सूझी; उसने अपनी एक कॉपी में कुछ कॉलम बनाए और उसमें लिखना शुरू किया कि किसने कब-कब उसे गधा कहकर पुकारा। लिखते हुए सप्ताह भर बीता होगा। जब उसने अपने शिक्षक के मुँह से यह संबोधन सुना तो उसने पाया कि यह इस सप्ताह में 17वीं बार था। उसे अपने अंदर कुछ ‘ढेंचू

Avinash Jha
Jul 212 min read
कुछ तो कहो
कुछ तो कहो; हाँ, सलीके से कहो; कि कहोगे तो बात चलेगी। चलेगी, तभी तो बात बनेगी! यूँ चुप न रहो; क्योंकि चुप्पी… कब घुटन बन जाती है पता ही नहीं चलता। असहज हो, तो कहो। दर्द में हो, तो कहो। कहोगे नहीं… तो भला बात कैसे बनेगी!

Avinash Jha
Jul 191 min read
नौवीं फेल
नौवीं कक्षा का मासूम बबलू एक नम्र निवेदन लेकर प्रिंसिपल ऑफिस में पहुँचा। बबलू ने कहा, “सर, मुझे स्कूल से मत निकालिए। मुझे NIOS (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग) में मत डालिए। मैं तीसरी बार फेल नहीं होऊंगा।” प्रिंसिपल सर ने कहा, “देखो बबलू, हम तुम्हें निकाल कहाँँ रहे हैं! तुम्हें नियमित विद्यालय के विषयों में पास होने में दिक्कत आ रही है। तुम्हें वह कठिन लगता है। यहाँ तो मज़बूरी है, तुम्हारा विषय बदल नहीं सकते। पर वहाँ आसान लगने वाले अन्य विषय लेकर तुम पढ़ सकते हो और तुम्हा

Avinash Jha
Jul 181 min read

