top of page

गधा

अपने 11 वर्ष की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते न जाने कई बार उसने लोगों के मुँह से अपने लिए ‘गधा’ संबोधन सुना होगा। 


‘ओए गधे! सुनता नहीं है।’ 


‘गधे! तुमसे नहीं होगा।’ 


‘गधा कहीं का! तुझे इतनी सी बात समझ नहीं आती!’


एक दिन अचानक उसे क्या सूझी; उसने अपनी एक कॉपी में कुछ कॉलम बनाए और उसमें लिखना शुरू किया कि किसने कब-कब उसे गधा कहकर पुकारा।


लिखते हुए सप्ताह भर बीता होगा। जब उसने अपने शिक्षक के मुँह से यह संबोधन सुना तो उसने पाया कि यह इस सप्ताह में 17वीं बार था। उसे अपने अंदर कुछ ‘ढेंचूं-ढेंचूं’ जैसा महसूस होने लगा था। तभी एक झन्नाटेदार चांटा इसके गाल पर पड़ा। 


‘बदतमीज़! मज़ाक उड़ाता है!’ 


वह बदहवास; चकित! 


‘मैंने कब और कैसे इनका मज़ाक उड़ाया? एक सवाल का जवाब ही तो नहीं दे पाया था!... कहने पर खड़ा भी हो गया था।’ 


पर ‘बदतमीज़’ शब्द सुन उसे अटपटा-सा लगा। यह नया था।


जब शिक्षक महोदय अपनी बौखलाहट लिए मुड़े तो प्रश्न भरी निगाहों से उसने अपने बेंच पर साथ बैठे मित्र की ओर देखा। उसने बताया कि वह थोड़े जोर से ‘ढेंचूं-ढेंचूं’ बोल गया था। उसकी आँखों से झरने वाले आँसुओं में कुछ और बूँद कब शामिल हो गए कहा नहीं जा सकता। 


उनके जाने के बाद वह सिर झुकाए बैठ गया। अब तो उसे अपनी आकृति भी वैसी ही लगने लगी थी। उसे लग रहा था कि कहीं गलती से इंसानों के बीच तो नहीं आ गया! क्या गधो के लिए कोई स्कूल नहीं है? …और वहाँ पढ़ाने वाले गधे ही होंगे न? शायद वे उसे ठीक से समझ पाएँ!


…और उसे सुनने को मिले -

‘अरे वाह! आपने तो क्या गज़ब तरीके से ढेंचूं-ढेंचूं किया है! …शाबाश!’

Recent Posts

See All
कुछ तो कहो

कुछ तो कहो; हाँ, सलीके से कहो; कि कहोगे तो बात चलेगी। चलेगी, तभी तो बात बनेगी! यूँ चुप न रहो; क्योंकि चुप्पी… कब घुटन बन जाती है पता ही नहीं चलता। असहज हो, तो कहो। दर्द में हो, तो कहो। कहोगे नहीं… तो

 
 
 
नौवीं फेल

नौवीं कक्षा का मासूम बबलू एक नम्र निवेदन लेकर प्रिंसिपल ऑफिस में पहुँचा। बबलू ने कहा, “सर, मुझे स्कूल से मत निकालिए। मुझे NIOS (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग) में मत डालिए। मैं तीसरी बार फेल नहीं

 
 
 

Comments

Rated 0 out of 5 stars.
No ratings yet

Add a rating
bottom of page