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ज़िम्मेदारी किसकी: एक पत्र अभिभावकों के नाम

वर्तमान और भविष्य के अभिभावक साथियों,


नमस्कार!


अब तक की जानकारी के अनुसार इस वर्ष NEET के 14 या उससे अधिक परीक्षार्थियों ने आत्महत्या की है। इन आत्महत्याओं का ज़िम्मेदार कौन है?


एक आंदोलन चल रहा है न्याय दिलाने के लिए, व्यवस्था ठीक करने के लिए, ज़िम्मेदारी तय करने के लिए। तो, अब जो चले गए, उन्हें भला न्याय क्या मिलेगा? जो रह गए, उनके न्याय का मामला है। सवाल यह भी उठता है कि न्याय कौन करेगा। यह किसके हाथ में है? विश्लेषण करने पर पाता हूँ कि उनके जीवन में जिनकी जितनी भूमिका है, उनके प्रति अन्याय के वे उतने ही दोषी हैं और न्याय की उनकी उतनी ही ज़िम्मेदारी बनती है।


शिक्षा नीति बनाने वाले और शिक्षा व्यवस्था चलाने वाले तो ज़िम्मेदार हैं ही कि वे शिक्षा के सही मायने को तय करने और उसे स्थापित करने में विफल रह रहे हैं। पर, क्या उन परीक्षार्थियों के माता-पिता, शिक्षकों और अन्य करीबी संबंधी भी किसी तरह ज़िम्मेदार हैं? आखिर उन बच्चों ने आत्महत्या क्यों की होगी? विचार कुछ ऐसे ही आए होंगे~


  1. इतनी मेहनत की, सब बेकार हो गया। ऐसी व्यवस्था में कुछ नहीं हो सकता। भविष्य अंधकारमय है। (निराशा…)

  2. एक बार फिर परीक्षा की तैयारी! यह सपना तो मेरा है ही नहीं! मैं डॉक्टर नहीं बनना चाहता/चाहती। मुझे फिर से वही सब पढ़ना पड़ेगा जिसमें मेरा मन लगता ही नहीं। मुझे कोई नहीं समझता। मेरा मन तो कुछ और करने का करता है… (दबाव…अकेलापन…)

  3. फिर से एक बार परीक्षा की तैयारी…बड़ी मेहनत करके तो अबकी परीक्षा दी थी। इस बार हुआ भी अच्छा था! न जाने अगली बार कैसे प्रश्न आएँगे? उस वक़्त क्या स्थिति होगी? (अनिश्चितता…)

  4. मम्मी-पापा ने मेरी पढ़ाई के लिए इतने पैसे लगा दिए हैं। कर्ज ले रखा है। घर की परेशानियाँ तो बढ़ ही गई हैं, मैं सिलेक्ट न हुआ/हुई तो क्या होगा? उन्हें कितना दुख होगा? उनसे कैसे नज़रें मिलाऊंगा/मिलाऊंगी? (अपराधबोध…)

  5. इस करप्ट सिस्टम में मेरा भला नहीं हो सकता। पैसे और पहुँच वाले हमारी मेहनत पर भारी पड़ते हैं। कोई यह पहली बार की बात तो है नहीं! ऐसा होता हुआ दिखता ही रहता है। ऐसी संघर्ष भरी ज़िंदगी भला मैं क्यों जीऊं? (खिन्नता…)


इसी तरह के अनेक विचार उन बच्चों के मन में उठे होंगे। पर उन्हें कोई न मिला होगा जिससे वे अपनी बात खुलकर साझा कर सकें और जिसके कंधे पर अपना सिर टिका सकें। अगला उसके साथ खड़ा हो और उसे एहसास करा सके- ‘आप जैसे हैं, मेरे लिए अनमोल हैं।’


हम बड़े उन्हें सपने तो दे देते हैं, पर वो सपने कब बोझ बनने लगे, क्या इसकी थाह रखते हैं? या फिर यदि सपना उसका अपना है तो हमारी पूरी कोशिश रहती है कि उसे पढ़ाई-लिखाई की सारी सहूलियतें उपलब्ध करा दें, पर मनोबल का क्या? भावनात्मक मज़बूती का क्या? क्या मानसिक और भावनात्मक सपोर्ट के लिए हमने कुछ किया? क्या हम उनके हर उतार-चढ़ाव के समय उनके मन की बात सुनने के लिए उपलब्ध रहे? क्या हम उन्हें यह एहसास दिलाते रहे कि वे अपने सपने को पूरा करने के लिए खुश रहते हुए अपनी ओर से पूरी मेहनत करें? …और जब भी कभी मन उकताने लगे, कभी घबराहट होने लगे, कभी लक्ष्य या रास्ता बदलने का मन करने लगे तो हमारी ओर से ‘मैं हूँ न!’ का उन्हें एहसास हो। उन्हें बताया जा सके- ‘मेरे लिए और आपके अपने लिए भी, किसी भी ऐसी सफलता या उपलब्धि से बढ़कर आप हैं, आपकी खुशी मेरे लिए ज़्यादा मायने रखती है। कोई किस व्यवसाय से जुड़कर अपना जीवन यापन करेगा, उसके तो अनेक विकल्प हैं। यह उनमें से मात्र एक है। यह हासिल हो तो ठीक, न हो तो ठीक। जब सीट्स ही लिमिटेड हों तो आपका न चुना जा पाना आपकी अयोग्यता तय नहीं करता, और यह भी सोचना ठीक नहीं कि यही पेशा/कार्य योग्यता का परिचायक है या सम्माननीय है। इसी उपलब्धि से हमारा सुख सुनिश्चित होगा, ऐसा भी नहीं है।’


तो, ज़िम्मेदार तो हम भी हैं! सिस्टम चलाने वाले यदि इसे ठीक से न चला पाए, योग्यता का सम्मान न कर पाए तो उन्हें क्या फर्क पड़ेगा? यदि उनमें सबके प्रति मानवीय संवेदना नहीं है, न्यायसंगत तरीके से चलने और चलाने की योग्यता नहीं है तो उनके लिए हमारे बच्चे केवल एक संख्या हैं। पर हमारे लिए… हमारे लिए तो वे जिगर का टुकड़ा हैं। उनके बिना तो हमारी ज़िंदगी अधूरी है। तो अपने जिगर के टुकड़े को, अपने अनमोल रत्नों को संभालकर रखने की बड़ी ज़िम्मेदारी किसकी है? मुझे लगता है, एक माता-पिता या अभिभावक के रूप में इस दिशा में सोचे जाने की ज़रूरत है।


सिस्टम में भी सुधार का प्रयास हो, पर अपने बच्चों को समझने, ज़िंदगी के प्रति उनकी समझ को स्पष्ट एवं पुष्ट करने, और उनके साथ खड़े रहने का एहसास देने के अर्थ में हमारी स्नेहपूर्ण बातचीत उनसे होती रहे, यह बहुत ज़रूरी है।


आपको क्या लगता है, ज़रूरी है न?


आपका साथी और एक अभिभावक…

अविनाश

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