top of page

साइकिल वाला सपना

राहुल दिल्ली के एक छोटे से मोहल्ले में रहता था। उसके पिता ठेला लगाकर सब्ज़ी बेचते थे। घर की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह एक फोन भी खरीद सके या ढंग के कपड़े पहन सके।


​स्कूल में लगभग सभी बच्चों के पास साइकिल थी, लेकिन राहुल के पास नहीं थी। वह रोज़ दो किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाता था और लौटते समय किसी दोस्त की साइकिल का कैरियर पकड़ लेता था।

​एक दिन शिक्षक ने कक्षा में सभी से पूछा, "बड़े होकर तुम क्या बनोगे?"

किसी ने डॉक्टर तो किसी ने इंजीनियर कहा। जब राहुल की बारी आई, तो वह खड़ा हुआ और बोला, "सर, मैं अपना बिज़नेस शुरू करूँगा, ताकि मेरे पिताजी को ठेला न लगाना पड़े।"

​यह सुनकर पूरी कक्षा हँस पड़ी। सबसे पीछे बैठे एक लड़के ने व्यंग्य किया, "तुम्हारे पास तो साइकिल खरीदने के भी पैसे नहीं हैं और तुम बिज़नेस करोगे?"

राहुल शांत रहा। उस रात उसने यह निश्चय किया कि वह इस हँसी का जवाब बातों से नहीं, बल्कि अपने काम से देगा।


​उसने एक उपाय निकाला। स्कूल की पढ़ाई के बाद वह पुराने अखबार, बोतलें और डिब्बे इकट्ठा करने लगा और उन्हें कबाड़ी को बेच देता था। इस तरह रोज़ के थोड़े-थोड़े पैसे बचाते-बचाते आठ महीनों में उसने 3200 रुपये जोड़ लिए। इन पैसों से उसने एक पुरानी (सेकंड-हैंड) साइकिल खरीदी। लेकिन यह साइकिल सिर्फ स्कूल आने-जाने के लिए नहीं थी।


उसने साइकिल के पीछे एक टोकरी लगाई। सुबह स्कूल जाने से पहले वह सब्ज़ी मंडी से कम दाम में आठ-दस किलो सब्ज़ी ले आता और मोहल्ले में घर-घर जाकर बेच देता था। इससे उन बुजुर्ग महिलाओं जिन्हें वह प्यार से अम्मा और दादी पुकारा करता, को बहुत सुविधा हो गई जो बाज़ार नहीं जा पाती थीं।


यह देखकर लोगों ने कहा, "क्या तुम इस काम के चक्कर में अपनी पढ़ाई छोड़ दोगे?"

राहुल ने उत्तर दिया, "नहीं, मैं अपनी आगे की पढ़ाई के लिए ही तो यह सब कर रहा हूँ।"

​बारहवीं कक्षा तक पहुँचते-पहुँचते उसके पास तीन साइकिलें हो चुकी थीं और दो लड़के उसके लिए काम करते थे। इसके बाद उसने कॉलेज में दाखिला लिया और बी.कॉम की पढ़ाई पूरी की।


​पाँच साल बाद, जिस लड़के पर कभी सब हंसते थे, उसने अपनी एक छोटी सी दुकान खोल ली। उसकी दुकान का पहला ग्राहक वही दोस्त था, जिसने कभी उसकी साइकिल का मज़ाक उड़ाया था। राहुल ने गिफ्ट के रूप में उसे मुफ्त सब्ज़ी दी और मुस्कुराते हुए कहा, "भाई, तुम सही थे। उस समय मेरे पास साइकिल के पैसे नहीं थे। लेकिन सपनों की कोई कीमत नहीं होती, उन्हें पूरा करने के लिए बस अटूट मेहनत की आवश्यकता होती है।"

Recent Posts

See All
गधा

अपने 11 वर्ष की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते न जाने कई बार उसने लोगों के मुँह से अपने लिए ‘गधा’ संबोधन सुना होगा। ‘ओए गधे! सुनता नहीं है।’ ‘गधे! तुमसे नहीं होगा।’ ‘गधा कहीं का! तुझे इतनी सी बात समझ नहीं

 
 
 
कुछ तो कहो

कुछ तो कहो; हाँ, सलीके से कहो; कि कहोगे तो बात चलेगी। चलेगी, तभी तो बात बनेगी! यूँ चुप न रहो; क्योंकि चुप्पी… कब घुटन बन जाती है पता ही नहीं चलता। असहज हो, तो कहो। दर्द में हो, तो कहो। कहोगे नहीं… तो

 
 
 
नौवीं फेल

नौवीं कक्षा का मासूम बबलू एक नम्र निवेदन लेकर प्रिंसिपल ऑफिस में पहुँचा। बबलू ने कहा, “सर, मुझे स्कूल से मत निकालिए। मुझे NIOS (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग) में मत डालिए। मैं तीसरी बार फेल नहीं

 
 
 

Comments

Rated 0 out of 5 stars.
No ratings yet

Add a rating
bottom of page