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कुछ तो कहो

कुछ तो कहो;

हाँ, सलीके से कहो;

कि कहोगे तो बात चलेगी।

चलेगी, तभी तो बात बनेगी!


यूँ चुप न रहो;

क्योंकि चुप्पी

कब घुटन बन जाती है

पता ही नहीं चलता।


असहज हो, तो कहो।

दर्द में हो, तो कहो।

कहोगे नहीं…

तो भला बात कैसे बनेगी!

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