शाकाहारी माँस
- Avinash Jha

- Jun 18
- 5 min read
क्या आपने शाकाहारी माँस खाया है? नहीं-नहीं, शाकाहारी का माँस नहीं, शाकाहारी माँस! नहीं समझे? यदि समझ गए तो बहुत बढ़िया, और न समझे तो आगे समझ आ ही जाएगा! चिंता की कोई बात ही नहीं! क्यों, इतनी-सी बात यदि ज़िंदगी के हर मामले में आ जाए, तो कैसी सहजता हो, कैसा आराम हो! कुछ पहले से आता हो तो बहुत बढ़िया, न आता हो तो जानने-सीखने का अवसर बना है, जान लेंगे, सीख लेंगे। आपको बताता हूँ कि क्या है यह शाकाहारी माँस और कैसे आया यह मेरी ज़िंदगी में!
पर उसे बताने से पहले आपसे वह एक बात साझा करना चाहता हूँ जो इस संदर्भ से मुझे जुड़ता हुआ लगता है। मनुष्य यदि शाकाहारी होता है या हो जाता है तो वह अपने में विशेष महसूस करने लगता है। उसके अंदर माँसाहार के विरुद्ध और शाकाहार के समर्थन में अनेक तर्क बने होते हैं, जिन्हें वह माँसाहारियों के सामने यथासंभव प्रस्तुत करता रहता है जिससे वे भी उसके जैसे हो जाएँ। उधर दूसरी ओर जो माँसाहारी मानव होते हैं, वे भी अपने तरकश में तर्कों के तीर तैयार रखते हैं। क्या सही और क्या ग़लत, क्या आध्यात्मिकता है और क्या प्रकृति-सहज, यह आप तय कर लीजिएगा। मेरा ध्यान तो मानव के इस विशेष प्रवृत्ति की ओर गया कि वह स्वयं को मल्टीप्लाई(multiply) करना चाहता है। अब यह मल्टीप्लाई करने का क्या मतलब? आप गौर करेंगे तो पाएँगे कि इंसान अपने जैसों की संख्या बढ़ाना चाहता है। जिस बात को उसने स्वीकारा हुआ है वह चाहता है उसी स्वीकृति के साथ जीने वालों से संसार भरा हो। शाकाहार-माँसाहार से लेकर धर्म और संप्रदाय के मामलों तक इसी प्रवृत्ति का तो फैलाव है! जब मैं इस प्रवृत्ति के मूल में जाता हूँ तो मानव के सदा सुखी रहने की चाहत देखता हूँ। वह इस तरह सुखी कितना रह पाएगा, यह भी विचार का एक मुद्दा है; पर इतना तो दिखता है कि व्यक्ति को अपने जैसों के साथ सहजता महसूस होती है।
पर मैं जो आपको घटना बताने वाला हूँ, वहाँ तो वे लोग इस दबाव से मुक्त दिखे! जब इसका कारण ढूँढने की कोशिश करता हूँ तो पाता हूँ कि किसी व्यक्ति की ख़ुशी का एक और महत्त्वपूर्ण आयाम है- वह जिसे अपना मान लेता है, उसकी ख़ुशी में ही वह अपनी ख़ुशी देखने लगता है।
खैर! ज़रा हम उस घटना के मुद्दे पर आते हैं। अब देखिए, इस शाकाहारी और माँसाहारी के बीच लोगों ने कुछ और वर्ग भी बना लिए हैं। सारा खेल या तो अपने खान-पान की पसंद का होता है या फिर अपने उस पसंद को एक सम्मानजनक स्थिति में रखने का नज़र आता है। जब वह अपनी किसी एक मान्यता को टूटता हुआ पाता है, और उसमें अपने सम्मान को ठेस पहुँचने जैसा लगता है तो वह एक और मान्यता गढ़ता है जहाँ उसकी आदतें बनी भी रह सकें और वह खुद को सम्मान के साथ देख सके। तो आपको पता ही होगा कि इस खान-पान के मामले में नए वर्गों के बनने के बाद अंग्रेजी में ये नाम सुनने में आते हैं - वेजीटेरियन, नॉन-वेजीटेरियन, एगीटेरियन… और एक विशेष ग्रुप बन गया है विगन (vegan)।
जब दुनिया नए-नए शब्द बना सकती है तो ऐसे में मैंने भी भोजन के एक स्वरुप को नाम दे दिया है- शाकाहारी माँस! हाँ, मेरी थाली में उस दिन था शाकाहारी माँस! यह भला क्या बला है? बस अभी बताता हूँ!
यदि आपने मेरी मछली के रिश्तेदार वाली घटना जान ली है, तो यह आपको पता चल ही गया होगा कि मेरा हृदय परिवर्तन हुआ था। …और यह घटना उसके बाद की है। मैं इस घटना के समय शायद छठी या सातवीं कक्षा में था।
मैं हॉस्टल में रहा करता था। भोजन का समय था। भोजनालय(mess) में हम अपनी खाँचे वाली थाली लिए हुए लाइन में खड़े थे। लाइन धीरे-धीरे सरक रही थी। मेरी बारी आई। मेरी थाली में चावल परोसा गया। आगे बढ़ा। उसमें दाल डाला गया। उसके बाद 2 रोटियाँ और उसके बाद मेरी थाली में वह डाला गया जिसकी मुझे बिल्कुल उम्मीद न थी। मेरी थाली में, इस शाकाहारी व्यक्ति की थाली में, झोर(सब्जी के रस) में डूबे हुए माँस के कई छोटे-छोटे टुकड़े सब्जी के लिए बने खाँचे में परोसने वाले ने डाल दिए। यदि मैं 3-4 साल पहले वाला व्यक्ति रहा होता तो शायद वह देख प्रसन्न हुआ होता; उस भोजन को देख मुँह में लार भी आया होता। पर यह क्या? आँखों से अश्रुधारा बह चली। माँस न खाना एक बात, पर यह तो मेरी पवित्र थाली भी अपवित्र हो गई थी! और अब मैं खाऊंगा क्या? मुझे रोते देख हमारे रसोई बनाने वाले भैया ने कहा, “अरे अविनाश! रोते क्यों हो? यह माँस नहीं है। यह तो पूरी तरह से शाकाहारी है।” पर मुझे उनकी बात स्वीकार नहीं हो रही थी। ऐसा लगा जैसे मुझे बहलाने की कोशिश की जा रही थी। ‘मुझे बेवकूफ बना रहे हैं। क्या मैंने कभी देखा या खाया नहीं है?’ …और दोनों गालों पर से धारा बही जा रही थी; मैं सिसकिया लेते हुए रोए जा रहा था। उन्होंने उसका नाम भी बताकर समझाने की कोशिश की - “यह तो … है।” पर मेरा निर्मल दृढ़निश्चयी बाल मन कुछ भी सुनने और मानने को तैयार नहीं था। एक बार जिसने इस कार्य को जीवहत्या के रूप में देख लिया हो, जिसने माँसाहार को किसी के रिश्तेदार छीनने जैसे कुकृत्य से जोड़ लिया हो, जिसने किसी अपने के खोने के दर्द के साथ इस माँस-भक्षण का नाता देखा हो, उस पर भला उनका कौन-सा तर्क चलता!
वहीं थोड़ी ही दूरी पर भोजन हेतु एक बेंच पर बैठे मेरे हिंदी के शिक्षक श्री युधिष्ठिर सर की नज़र मुझ रोते हुए बालक पर पड़ी। उन्होंने मुझसे जब रोने का कारण पूछा, तो रोते-रोते ही मेरा उत्तर आया, “सर, मेरी थाली में माँस दे दिया गया है।” उनके चेहरे पर स्नेहपूर्ण गंभीरता बनी रही। उन्होंने हमारे रसोइया भैया को बुलाया। उन भैया ने उनसे धीरे से कुछ कहा। शायद यही कि उन्होंने मुझे बताने की कोशिश की थी। पर ‘सर’ ने उनसे बस इतना ही कहा, “कोई बात नहीं! दूसरी साफ थाली में इसे अलग से खाना परोसकर दे दो।” उसके बाद मुझे कोई समझाने बुझाने का काम नहीं किया गया। मुझे अलग साफ-सुथरी थाली में अलग भोजन दे दिया गया।

उन भैया और अपने शिक्षक का वह स्नेह भरा व्यवहार मेरे अंतर्मन में गहरी छाप के साथ आज भी अंकित है। भला मैं उस पल को कैसे भुला सकता हूँ! समय बीता…समझ बढ़ी…तो समझ आया कि उस दिन मेरी थाली में माँस के टुकड़े नहीं, सोयाबीन की बड़ियाँ डाली गई थीं। मेरी वह कैसी अज्ञानता और अज्ञानता के प्रति दृढ़ता थी! साथ ही कितना गहरा उनका स्नेह था! कोई दबाव नहीं! मेरे उन भावुक पलों में उसी पल समझा देने का उनकी ओर से कोई उतावलापन नहीं!
आज जब मैं उस घटना का विश्लेषण करता हूँ तो अपने लिए बहुत कुछ पाता हूँ। हमारी मान्यता हमें कितना प्रभावित करती है। जो मैंने मान लिया, मेरे लिए तो वही अटल अपरिवर्तनीय सत्य होता है और वह अपने सभी प्रभावों के साथ होता है। यदि मैं माँसाहार करता हूँ तो उस भोजन से आनेवाली गंध मेरे लिए लार पैदा करने वाली खुशबू हो जाती है और जब वही भोजन मेरे लिए त्याज्य हो जाता है तो वही गंध मेरे अंदर उसके प्रति घृणा पैदा करती है और मुँह में लार नहीं, थूक बनता है।
पर सवाल एक और भी है कि सही तरह से जीना मान्यताओं से होगा या सही को पहचानकर। अस्तित्व में जो जैसा है वैसा जानकर जीना सहज होगा, या फिर ‘अपने-अपने सच’ यानी सच के किसी एक पक्ष मात्र या अधूरे सच या भ्रम के साथ चलकर! मेरा ध्यान जाता है कि जब तक सही को जाना नहीं तब तक भ्रम हमें अपने प्रभाव में जकड़ेगा ही।
तो अब स्थिति क्या है? अब मैं बड़े स्वाद से वह शाकाहारी माँस खाने लगा हूँ, पर माँस मानकर माँस का स्वाद पाने के लिए नहीं, बल्कि एक पोषक शाकाहार के रूप में जानकर उसकी पौष्टिकता और स्वाद के लिए। किसी दुकान के बाहर बिरयानी का बोर्ड लगा हो तो दूर से ही निकल जाने की कोशिश रहती है, पर यदि उस नाम के पीछे ‘वेज’ लिखा मिल जाए तो मुझमें उस भोजन को ग्रहण करने की आतुरता दिख सकती है क्योंकि उसमें भी मिलती हैं…सोयाबीन की बड़ियाँ…और लौट आती है उस घटना की याद, और समझ के बाद की मुस्कान!




Comments