मछली के रिश्तेदार
- Avinash Jha

- Jun 5
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मैं शायद उस समय चौथी कक्षा में पढ़ता रहा होऊंगा। जहाँ हम रहा करते थे, वहाँ से अपने गाँव जाना हुआ। मुझे याद आता है कि हमारा बाँस पर मिट्टी की लेप वाली दीवार वाला घर हुआ करता था। आँगन भी गोबर और मिट्टी से लिपा हुआ था। उस दिन घर में कुछ विशेष बन रहा था। माँ ने आँगन में एक मिट्टी के चूल्हे पर कड़ाही चढ़ाई हुई थी। उसमें मछलियाँ तली जा रही थीं। मछलियों के टुकड़ों को तले जाते देख अनायास ही मन में एक खयाल आया और मैंने माँ से पूछ डाला, “माँ, इन मछलियों के भी तो माता-पिता, भाई-बहन होते होंगे!” जवाब आया,”हाँ, बिल्कुल!” पर सवाल तो उनका जवाब सुनने के लिए था ही नहीं; यह तो स्वयं के अंदर उपज रहा विचार था जो किसी निष्कर्ष की तलाश में था। तभी मन में अगला विचार कौंधा- “जैसे हम इनमें से किसी को खा जाते हैं, वैसे ही कोई यदि मेरे माता, पिता, भाई, बहन या किसी और रिश्तेदार को मारकर खा जाए तो मुझे कैसा लगेगा?” इस विचार ने मेरी ज़िंदगी को मोड़ दिया। मैंने मांस-मछली खाना छोड़ दिया।
हाँलाकि यह बदलाव कुछ दिक्कतें लेकर भी आया। खानपान स्थान विशेष की संस्कृति का हिस्सा होता है। बिहार के मैथिल ब्राह्मणों में यह भोजन सामान्य है। चाहे आपने यह छोड़ दिया हो, पर सब आपकी तरह छोड़ दें, ऐसा होता नहीं है। वैसे भी ऐसा करना मेरा अपना निष्कर्ष था, सबका तो था नहीं! ऐसे में जब भी ऐसा कुछ घर में बनने की बात होती या बनता, मैं या तो विरोध में या अलग-थलग पाया जाता। ऐसा नहीं है कि परिवार में एकमात्र मैं ही था जिसने माँस-मछली खाना छोड़ा था। बड़े भैया, बड़ी बहन और मुझसे छोटी बहन भी नहीं खाती थीं। पर एक अंतर जो आता हुआ दिखा, वह था- मुझमें माँस-मछली खाने के प्रति घृणा का भाव गहरा होता चला जाना।
खैर! धीरे-धीरे माँ, पिताजी तथा परिवार के कई अन्य सदस्यों ने भी ऐसा भोजन करना छोड़ दिया।
समय बीता। मैं ज़िंदगी के उस पड़ाव में पहुँचा जब मैं नौकरी करने लगा और मेरी शादी की बात चलनी शुरू हुई। मेरी बस यही शर्त थी कि लड़की पढ़ी-लिखी हो और विशेष रूप से ध्यान रखने की बात- वह शाकाहारी हो। मुझे कहा जाता कि मैथिलों में ऐसी लड़की मिलना तो मुश्किल होगा। मैं चिंता न करूँ; यदि खाती भी होगी तो वह शादी के बाद माँसाहार छोड़ देगी। मैं इस मामले में अपना विचार बदलने को तैयार नहीं था। मुझे पहले से ही वह शाकाहारी चाहिए थी। मेरा सीधा सा तर्क था कि यदि मैं शादी के बाद अगले के खान-पान को बदले जाने की चाहत रखूंगा तो वह भी तो मुझमें बदलाव की चाहत रख ही सकती है। …और मैं माँसाहार शुरू कर दूँ, यह मुझे स्वीकार नहीं था क्योंकि बात स्वाद की नहीं थी, बात तो थी जीव हत्या की, किसी को मेरे कारण मिलने वाले दुःख की।
एक रिश्ता ऐसा आया। पता चला कि लड़की शाकाहारी है। बात बन गई। शादी हो गई।
अब संयोग देखिए! शादी के बाद बातों-बातों में पता चला कि उन्होंने भी बचपन में माँसाहार किया था। फिर उन्होंने माँसाहार छोड़ा क्यों?
इसकी भी अपनी एक कहानी है। जहाँ वे रहती थीं वहाँ 5-7 लोगों ने मिलकर एक बकरा पाला था। वे भी उसे खिलाती-पिलाती थीं। उसके साथ खेलती थीं। एक होली के दिन उनकी नज़र के सामने ही उन लोगों ने खाने के लिए उसे काट डाला। उसका कराहना… उसकी गर्दन से बहता खून… यह सब सुनने और देखने ने उनके अंदर कुछ बदल दिया। उस दिन से उन्होंने माँसाहार त्याग दिया।
जीवों के प्रति एक जैसे दया भाव ने हमें बेहतर जोड़ा हुआ है, जो शायद दबाव में उनके द्वारा शाकाहार स्वीकार कर लेने से नहीं हुआ होता।
जब मैं इन दोनों परिवर्तनकारी घटनाओं को देखता हूँ तो ध्यान जाता है कि जिन्हें भी हम अपना स्वीकार लेते हैं, हमसे उनका अहित नहीं देखा जाता, चाहे वह दूसरा इंसान हो या फिर कोई और जीव।
सोचने का मुद्दा फिर भी बना हुआ है कि इस दुनिया में न जाने कब तक मारे जाएँगे मछलियों के रिश्तेदार!
पर उससे भी बड़ा मुद्दा है कि क्या इंसान ने इंसान के साथ भी रिश्तेदारी निभाई है! बहुतायत में झगड़े, फ़साद और मार-काट होते हैं क्योंकि उनमें दिखते ही नहीं हैं हमें अपने रिश्तेदार!!!




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