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हे वटवृक्ष!



उस दिन वट सावित्री की पूजा का दिन था। आवश्यकतावश घर में यह प्रश्न उठा कि क्या आसपास में कोई बरगद का पेड़ है। यह तो आपको पता ही होगा कि यह व्रत हिन्दू विवाहित स्त्रियाँ अपने पति की सुखद लंबी आयु के लिए करती हैं। इस व्रत में वे बरगद के पेड़ की परिक्रमा करते हुए कलावा/धागा उसके तने पर लपेटती हैं। तो, हम जहाँ रह रहे थे, मुझे उस समय उसके आस-पास में बरगद के पेड़ की कोई जानकारी नहीं थी। पर एक दिन साथ में घर लौटते वक़्त श्रीमतीजी को रास्ते में एक जगह बरगद का पेड़ दिखा था। उन्होंने तभी कह दिया था कि वह पेड़ चूँकि घर से अधिक दूरी पर था तो मुझे पूजा के लिए उसकी एक टहनी का इंतज़ाम करना पड़ सकता था। अब इसके आगे की घटना ठीक से याद नहीं कि टहनी तोड़कर लानी पड़ी और तब पूजा हुई थी या फिर किसी अड़ोसी-पड़ोसी से किसी पास के बरगद के पेड़ की जानकारी मिल गई थी, जहाँ उन्होंने जाकर पूजा की। पर जिस बात ने मेरा ध्यानाकर्षण किया वह याद है। 


मन में प्रश्न उठा- ‘जिसकी पूजा की जानी है उसी को नुकसान पहुँचाने की बात कैसे की जा सकती है?’ यह तो वही हुआ कि मैं यदि किन्हीं का बहुत आदर करता हूँ, उन्हें पूजता हूँ तो मैं उनका एक हाथ या टांग, या फिर एक उंगली ही सही, काटकर अपने घर ले आऊँ और उसे प्रतीक रूप में सामने रखकर उसके गुणगान करूँ और अपने लिए आशीर्वाद मांगू। …और क्या जिस अपने आराध्य को मैंने क्षति पहुँचाई हो वे मेरे शुभ की कामना करेंगे!... खैर! भौतिक रूप से देखें तो वहाँ इंसान का मामला नहीं था। वह तो मात्र एक पेड़ था! ...कैसा विरोधाभास? टहनी तोड़ते वक़्त वह मात्र पेड़ और पूजा करते वक़्त हमें देखने, सुनने वाले और हम पर कृपा बरसाने वाले देवता! कहीं तो कुछ गड़बड़ है!


थोड़ा विश्लेषण करते हैं। कारण और उद्देश्य के रूप में ‘क्यों’ का उत्तर ढूँढते हैं। जब कभी यह मान्यता या उससे जुड़ी पूजा शुरू हुई होगी तो क्या कारण रहा होगा? चूँकि उस समय को मैंने नहीं देखा तो एक अनुमान से यह तर्क रख रहा हूँ। बरगद अपनी लंबी आयु, अपनी विशालता, पर्यावरण में ऑक्सीजन की उपलब्धता में योगदान एवं औषधीय गुणों के लिए पहचाना गया होगा। ऐसे में प्रकृति के इस अनमोल देन के प्रति कृतज्ञता भाव रखते हुए और उसके महत्त्व को जान उसका संरक्षण करने के उद्देश्य से शायद यह शुरू किया गया होगा। बुद्धिमान लोगों ने इसे आस्था से जोड़कर सोचा होगा कि लोग जिसकी पूजा करेंगे उसे क्षति नहीं पहुँचायेंगे। पर जब कारण/उद्देश्य(reason/purpose) अगली पीढ़ी तक नहीं पहुँचेगा और केवल प्रक्रिया(process) पहुँचेगी तो ऐसा कुछ घटित होने में आश्चर्य की बात नहीं। 


इसी तरह आपने बरगद और पीपल के पेड़-पौधों के लिए यह भी सुना होगा कि हिंदू मान्यता के अनुसार उन्हें काटना या उखाड़ना पाप कर्म है। ऐसे में मैंने देखा है कि आवश्यकता पड़ने पर कुछ लोग खुद तो नहीं उखाड़ते, पर किसी दूसरी जाति या धर्म के व्यक्ति से यह कार्य करवा लेते हैं। यदि उनके मकान के जड़ में या छत पर यह उग आया हो, और उसका प्रत्यारोपण भी संभव न दिखे, तो वह करे भी क्या? मकान भी बचाना है और पाप भी न लगे! ऐसे में वही एक रास्ता दिखता है। है न हास्यास्पद? यदि उनके न काटने, उखाड़ने के मूल उद्देश्य को समझा जाता तो यह मामला प्रकृति में ऐसे पेड़ों की प्रचूरता बनाए रखना था। ऐसे में ध्यान जाता है कि ऐसे पेड़ उचित स्थानों पर खूब लगाए जाएँ और उनका संरक्षण हो, न कि पाप के डर से दीवार या छत पर उगे पौधों के मामले में उन्हें मकान को नुकसान पहुँचाने के लिए छोड़ दिया जाए या फिर दूसरे से उखड़वाने का पाखंड किया जाए। ऐसा मुझे लगता है। ...आपको क्या लगता है?


मैं आने वाले समय में ऐसे अवसरों पर क्या करूँ- बरगद के साथ अपने होने और जीने के स्वरूप को देखूँ या फिर उनका एक अंग तोड़कर अपने आँगन में स्थापित करूँ और कहूँ-

"हे वटवृक्ष! ..."


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