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मेरी प्यारी दोस्त

Jun 26
2 min read

यह बात तब की है, जब मैं चौथी कक्षा में पढ़ती थी। उस वक्त मेरी उम्र यही कोई 9 साल रही होगी। बचपन के उस दौर में स्कूल में मेरी एक सहेली थी—कुमकुम। वह सिर्फ मेरी दोस्त नहीं थी, बल्कि मेरी बहन जैसी थी। पढ़ाई-लिखाई में वह मुझसे काफी अच्छी थी और हमेशा मेरी मदद के लिए तैयार रहती थी। उसका वो मुस्कुराता हुआ चेहरा मुझे आज भी याद आता है।


वक्त बीता और हम दोनों साथ में पांचवीं कक्षा में आ गए। हमारी दोस्ती और गहरी हो चुकी थी। एक दिन क्लास में हमारा सामाजिक विज्ञान का टेस्ट था। परीक्षा के दौरान मैं एक सवाल में थोड़ा अटक गई, तो कुमकुम चुपके से मेरी मदद करने लगी। हम दोनों अपनी ही धुन में थे कि तभी दूसरी तरफ से अचानक क्लास टीचर आ गईं। इससे पहले कि हम कुछ समझ पाते, मैम ने कुमकुम को एक ज़ोरदार चांटा मार दिया।


वह थप्पड़ इतना तेज़ था कि कुमकुम के नाक से खून बहने लगा। अपनी सबसे प्यारी दोस्त की यह हालत देखकर मैं बुरी तरह डर गई और कांपने लगी। मैं तुरंत उसे संभालते हुए मेडिकल रूम की तरफ भागी। वहां ड्यूटी मैम ने रुईसे उसकी नाक साफ़ की और उसकी हालत देखकर उसे घर भेज दिया।


कुमकुम के जाने के बाद मेरा रो-रोकर बुरा हाल था। क्लास में मेरा मन बिल्कुल नहीं लग रहा था। अपनी उस सहेली के बिना मुझे वो स्कूल, वो क्लास सब सूना लगने लगा। आखिर मुझसे रहा नहीं गया और मैंने भी पेट दर्द का बहाना बनाया और रोते हुए घर आ गई। उस पूरे दिन मेरी आंखों से आंसू नहीं थमे। मुझे बस यही लग रहा था कि मेरी वजह से उसे इतनी बड़ी सज़ा मिली।


अगले दिन जब मैं एक नई उम्मीद के साथ स्कूल पहुंची कि आज कुमकुम से मिलूंगी, उसे गले लगाऊंगी... तो वहां मुझे एक ऐसी खबर मिली जिसने मेरा दिल ही तोड़ दिया। मुझे पता चला कि कल की उस घटना से आहत होकर कुमकुम के घरवालों ने उसका स्कूल से नाम कटवा दिया है और उसने हमेशा के लिए स्कूल छोड़ दिया है।


वह दिन मेरी ज़िंदगी का सबसे उदास दिन था। उसके जाने के बाद स्कूल में मेरा मन कभी लगा ही नहीं। हर बेंच, हर कोना मुझे उसी की याद दिलाता था। वह बचपन का एक ऐसा ज़ख्म था जो आज तक नहीं भरा। कुमकुम के जाने के बाद... मैंने आज तक फिर कभी कोई दूसरा दोस्त नहीं बनाया। वह आज भी मेरी यादों में मेरी वही प्यारी और सबसे अच्छी दोस्त बनकर रहती है।

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