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ग़ुलामी की एक और दास्ताँ...

ब्रांड जब स्टेटस सिंबल बन जाए और उसके लिए क्वालिटी के हिसाब से अधिक खर्च करने का मन करने लगे, तो क्या यह एक मानसिक ग़ुलामी का संकेत नहीं!


एक बार गिफ्ट के रूप में मुझे एक प्रसिद्ध ब्रांड का पेन सेट मिला। देने वाले ने भी मुझसे अत्यधिक स्नेह दर्शाने हेतु एक बड़ी कीमत चुकाई होगी। पर जब बारी इस्तेमाल की आई तो उस पेन की लिखाई पसंद नहीं आई। यादगार रूप में वह पेन दराज़ में रख दिया गया। अपने इस्तेमाल के लिए अपनी 5 रूपए वाली कलम मुझे ज़्यादा अच्छी लगी। उस उपहार वाले पेन की कीमत में तो मेरे काम के पेन करीब 40-50 आ जाते! इस विचार का आना क्या किसी बदलाव का संकेत था?


कुछ समय बाद की बात आपको बताता हूँ। एक ऐसे ही अवसर पर मेरे उपहार देने की बारी थी। यह भला कैसे हो सकता था कि किसी 5-10 रूपए वाले पेन से अपना स्नेह व्यक्त कर दूँ! उस ब्रांड का पेन नहीं लेना, यह निष्कर्ष तो स्पष्ट था; पर कुछ वैसा ही या उसी कीमत के आसपास का उपहार ले जाना ही उचित लगा। भला मेरे स्नेह की कीमत उसके स्नेह से कम क्यों हो?


अब यह क्या था?

 
 
 

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