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हम तो अईसे ही जिए हैं

May 3, 2020
2 min read

Updated: May 4, 2020

सुरजन काका की मड़ई (छप्पर) उठाने में सब अपना खूब जोर लगा दिए फिर अपने घर आए और दही डालकर गुड़ (राबि) का बना हुआ रस (शर्बत) चना के घुघरी (काले चना का छोला) के साथ तीन- चार गिलास पी गए। उसके बाद लरिकन (बच्चों) को अपने गाँव-घर में कौन पायेगा? पूरा गाँव अपना था, सारा बाग अपना था। कुलि लरिका बगइचा (बाग) में जाके आम और जमुआ बीन कर खाते थे। मई के अंतिम हफ्ते में हमारा घिलौना आम पक जाता था और उसके बाद अमोलवा फिर लहसुनिया। तोड़हवा और बुद्दी थोड़ा देर से पकता था। जब ये सब आम खतम होते तो भेलियहवा और गोबरहवा का नंबर आता था।

एक- दूसरे के साथ दिन भर बगिये में रहते थे। न जात का चक्कर था न पात का। जब घर पर आते थे तो वही गर्मी का फेवरेट डिश रोटी और दाल मिल जाता था, दाल में हरियर मर्चा (हरा मिर्च) टुकड़ा करके डाल लेते थे क्या मज़ेदार स्वाद हो जाता था। रात को तो रोटी और गाय का गरम गाढ़ा दूध, मजा ही आ जाता था। सुबेरे के समय में दही के मट्ठा में बसिया (बासी) रोटी मसलके माई (दादी) सबको देती थीं बच्चे उठा- उठा कर पी लेते थे फिर कभी खलिहान में जाकर मिट्टी का घर बनाते थे तो कभी "चनियवा ताल" (तालाब) में नहा आते थे। बड़े लोग अपने खेती-बाड़ी में मस्त तो बच्चे अपने मस्ती में।

ऐसा नहीं है कि उस समय लोग पढ़ते-लिखते नहीं थे। उस समय भी पढ़ाई लिखाई होती थी । कुछ लोग अपने इलाके के विद्वान माने जाते थे। चाहे कानूनी मामला हो चाहे खेती-बाड़ी का मामला हो सब का समाधान उनके पास रहा करता था। गाँव में उस समय जिन्हें अंग्रेजी बोलना आता था उन्हें लोग बहुत समझदार मानते थे। लोग कमाने-धमाने बाहर जाया करते थे पर गाँव से जुड़े रहते थे । पूरे गाँव में भैया-भौजी, बुआ-काका पाए जाते थे चाहे वे किसी भी बिरादरी (जाति) के हों । हर बच्चा सुरक्षित था किसी के भी घर आने-जाने में भय नहीं होता था। यह सब संबंध मिलजुलकर जीने के अभ्यास के कारण ही था लोग एक दूसरे पर निर्भर थे । किसी के भी नात-रिश्तेदार पूरे गाँव के रिश्तेदार होते थे । पहुना(मेहमान) के आने पर किसी के यहाँ से दही, किसी के यहाँ से पकाई हुई कोई सब्जी, राबड़ी सब आ जाती थी । पहुना समझ ही नहीं पाते थे की इतना आइटम कब तैयार हो गया । यह सब आगे चलकर ख़तम हुआ जब पैसा का होड़ लग गया। अब लोग सम्बन्ध से ज्यादे पैसा को महत्व देने लगे । पहले आदमी का आदमी से सम्बन्ध के कारण सब कुछ उपलब्ध रहता था पर जबसे पैसा

बोलने लगा की आदमी की जरूरत नहीं है सबकुछ हमहीं से मिलेगा और जबसे सबकुछ बाज़ार में मिलने लगा तबसे आदमी भी बाज़ार की ही वस्तु बन गया । अब तो आदमी भी अपना दाम(कीमत) लगाने लगा है, सारा सम्बन्ध व्यवसाय में बदल गया ।

अब अगर पाठशाला और परिवार में हमलोग ई समझा पायें की आदमी ही काम की चीज़ है तो पुरनका(पुराना) दिन और अच्छा होकर फिर लौट आयेगा । सम्बन्ध तो वही हैं बस फिर से ज़िंदा करना है अगर कर सके तो बहुत बड़ा काम हो जाएगा।

 
 
 

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