हम और वे...
- Avinash Jha

- 2 days ago
- 8 min read
आज मेघा बहुत खुश थी क्योंकि आज उसके स्कूल में वार्षिकोत्सव था। वह खूब चहक रही थी क्योंकि आज वह मंच पर डांस करने वाली थी। कई दिन से वह अभ्यास कर रही थी अपने फ्रैंड्स के साथ। स्कूल में, घर में, जब भी मौका मिलता वह डांस की प्रैक्टिस किया करती। आज वह अवसर था कि अपनी कला को वह मंच पर प्रस्तुत करे। आज उसकी नींद भी बड़ी जल्दी टूटी थी या यूँ कहिए कि शायद वह पिछली रात ठीक से सोई ही नहीं! कैसे रात बीती पता ही न चला! सुबह 4:00 बजे अचानक से उसका ध्यान गया- ‘मैंने सारी चीजें रख ली हैं न? …और मेरी साड़ी भी ठीक से धुली हुई है न?’ उसने उठकर चेक किया, सब कुछ ठीक था। फिर थोड़ी-सी झपकी ली, तो आँख लग गई। 5:35 पर फिर नींद टूटी और अब तो उसका सोने का मन ही नहीं कर रहा था। हल्का-सा म्यूज़िक चलाया और फिर थिरकने लगी।
लगभग 6:00 बजे के आसपास उसने मम्मी से कहा, “मम्मी, मुझे जल्दी से तैयार कर दीजिए। मुझे डांस वाली साड़ी पहना दीजिए।
मम्मी ने कहा, “चलो, नहा-धो लो। कुछ नाश्ता बना देती हूँ। नाश्ता कर लेना। उसके बाद मैं आपको डांस के लिए तैयार कर दूंगी।
उसने नहाने के बाद हल्का-सा नाश्ता किया। आज उसे भूख भी जो नहीं लग रही थी! फिर मम्मी ने उसे डांस के लिए तैयार कर दिया। तैयार होते ही वह अपनी सहेली दीया के साथ स्कूल के लिए निकल पड़ी।
दोनों सहेलियाँ जब स्कूल पहुँचीं तो स्कूल सज रहा था। सभी के स्वागत के लिए कई टीचर्स और बच्चे व्यवस्था में लगे थे। पूरा प्रांगण ऐसा लग रहा था जैसे आज सजधज-कर सभी के लिए किसी विशेष अवसर का निर्माण कर रहा था। उस वातावरण में एक अलग ही तरह का सुहानापन था, रोमांच था। जिधर नज़र जा रही थी उधर उत्साह भरा था। हर व्यक्ति जैसे अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हुए अपना बेस्ट देने के लिए लगा हुआ था। कोई अपना एक्जीबिट सजा रहा था, कोई मंच-सज्जा में लगा था, कोई कुर्सियों को व्यवस्थित कर रहा था, कोई उसे साफ करने में लगा था, कोई चार्ट चिपका रहा था। सब व्यवस्था की अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी देख रहे थे।
मेघा को आज का दिन बहुत अच्छा लग रहा था क्योंकि अन्य दिनों की तरह आज माहौल में पढ़ने-पढ़ाने वाला कोई दबाव नहीं था, उमंग ही उमंग हर तरफ! उन्होंने अपनी कल्चरल इंचार्ज टीचर के पास जाकर अपने आने की सूचना दी, और अपने अन्य साथियों के साथ दोनों सहेलियाँ एक कमरे में फिर से प्रैक्टिस करने लगीं। इतने बड़े स्कूल में कुछ ही बच्चों को तो मंच पर आने का मौका मिलता है! उन्हें यह मौका मिला था तो वे अपना बेस्ट देना चाहते थे।
9:00 बजे कार्यक्रम शुरू होना था। पता चला कि 1 घंटे की देरी होगी क्योंकि पिछली रात बारिश होने के कारण टेंट का काम हो नहीं पाया था। खैर, 9:00 बज गए। वह बेताब थी मंच पर जाने के लिए। 9 से अब 9:30… 10 और अब तो करीब 10:30 बज गए थे।
पर तभी उपस्थित बच्चों को व्यवस्थित रूप से बैठने का निर्देश हुआ। कई अतिथि तो आ गए थे, पर मुख्य अतिथि अभी आए नहीं थे। समय ज़्यादा हो रहे होने के कारण कार्यक्रम शुरू किया गया। शुरुआत सरस्वती वंदना से हुई जिसे विद्यालय की अन्य छात्राओं ने प्रस्तुत किया। इसी तरह और एक-दो कार्यक्रम होने के बाद कुछ पुरस्कार वितरण का कार्यक्रम भी रहा। …और अब वह इंतज़ार की घड़ी समाप्त हुई। मंच से उनके ग्रुप को नृत्य के लिए आमंत्रित किया गया। उसकी सजी-धजी टोली मुस्कुराती हुई मंच पर पहुँची। मंच पर अपनी-अपनी पोजीशन लेते ही गाना चल पड़ा। सभी को मोहित करने वाले अंदाज़ में वे थिरकने लगे। उनके चेहरों की मुस्कान, उनकी भाव-भंगिमा, सबने दर्शकों को मंत्र-मुग्ध किया हुआ था। पूरे ग्रुप का डांस बड़े ही तालमेल में था। थोड़ी देर बाद उनका गाना समाप्त हुआ और वे मंच से उतर ही रहे थे कि तभी उनकी एक टीचर ने उन्हें वहीं रुकने का इशारा किया। वे उनके परफॉर्मेंस से इतनी खुश थीं कि उनके साथ एक फोटो खिंचवाने के लिए मंच पर दौड़ी आ गईं। यह मेघा और उसके साथियों के लिए किसी बड़े पुरस्कार से कम न था! वे फोटो खिंचवाने के बाद मंच से नीचे उतरे और कार्यक्रम जारी रहा।
वे उतरकर अभी चेंजिंग रूम में पहुँचे ही थे कि उन तक सूचना पहुँची- ‘कुछ भी हल्का-फुल्का खा-पी लो क्योंकि तरोताजा बने रहना है। दोबारा बुलाया जा सकता है। अभी हमारे मुख्य अतिथि जो नहीं आए हैं!’ उनका चेहरा ऐसे खिला जैसे उन्हें किसी ने एक और पुरस्कार दे दिया हो। हालांकि प्यास तो लग रही थी, पर इस सूचना ने उन्हें एक अलग ऊर्जा से भर दिया। आखिर दोबारा बुलाने का मतलब क्या है- यही न कि डांस पसंद आया! पूरा ग्रुप उछल पड़ा।
खैर, कार्यक्रम चलता रहा। मुख्य अतिथि तो अब तक नहीं आए थे। हाँ, पर तभी माननीय पार्षद जी का आना हुआ। उनके आते ही मेघा के ग्रुप को दोबारा प्रस्तुति का मौका मिला। पूरे उत्साह के साथ उन्होंने नृत्य पेश किया। तालियों की गड़गड़ाहट हुई। कुछ दर्शक बच्चों ने हूटिंग भी की। ये सब संकेत थे कि उन्हें उनका डांस बहुत पसंद आया था।
इसी क्रम में फिर से उन्हें सूचना दी गई- ‘अभी कहीं मत जाना। कपड़े मत बदलना। मुख्य अतिथि आएंगे।’
काफी इंतज़ार के बाद, लगभग 1:00 बजे मुख्य अतिथि पहुँचे…जिले के डिप्टी एजुकेशन ऑफीसर! पूरी गर्मजोशी के साथ विद्यालय में उनका स्वागत हुआ। और यह क्या! मेघा का ध्यान गया कि कार्यक्रम के शुरू में किया जाने वाला दीप प्रज्ज्वलन भी अब तक नहीं हुआ था। जबकि माँ सरस्वती की वंदना हो गई थी। उसके अंदर प्रश्न घुमड़ पड़े- ‘यह कैसी बात हुई? क्या ये मुख्य अतिथि ईश्वर से भी ऊपर हो गए?... या हमने इन्हें इतना ऊँचा उठा दिया है? पर भला क्यों? क्या सरस्वती वंदना दीप प्रज्ज्वलन के बाद नहीं होनी चाहिए थी?’ फिर उसके मन में विचार आया कि इन बड़े लोगों ने यदि कुछ तय किया है तो ठीक ही किया होगा!
वह फिर से अपने डांस के खयालों की दुनिया में खो गई… कभी वह पैर को यूँ मूव करती, कभी यूँ हाथ हिलाती, कभी कमर लचकाती। वह पर्दे के पीछे ही थी कि सूचना आई- ‘तैयार रहो! अब फिर से आपकी प्रस्तुति होगी।’ पर अब थोड़ी-सी थकान उसे महसूस होने लगी थी क्योंकि अबकी बार यह एहसास नहीं हो रहा था कि लोगों की प्रशंसा के कारण उसे मंच मिलने वाला था। उसे तो लगा जैसे वह कोई वस्तु हो जिसका प्रदर्शन उस मंच से किया जाने वाला था… उस व्यक्ति के लिए जिसे लोग ईश्वर से भी ऊँचा दर्जा दिए हुए थे। मन में उलझन थी।
कार्यक्रम आगे बढ़ा। मुख्य अतिथि तथा अन्य गणमान्य लोगों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन किया गया और उसके बाद जब मंच से मेघा के ग्रुप को आमंत्रित किया गया तो अपनी सहेलियों के साथ वह फिर प्रस्तुत हुई। थकान थी, पर दिखने न दिया। प्यास लगी थी, पर उसका असर परफार्मेंस पर न पड़ने दिया। किसी को एहसास न होने दिया कि वह थक चुकी है और थोड़ी टूटी भी है क्योंकि अब उसे अपनी कला के प्रदर्शन से ज़्यादा स्वयं के प्रदर्शन की वस्तु के रूप में इस्तेमाल किए जाने का एहसास हुआ। खैर, वह मंच पर थी और पूरी तन्मयता से, पूरे उत्साह से उसने अपने साथियों के साथ नृत्य प्रस्तुत करना शुरू किया। पर यह क्या? मुख्य अतिथि और उनके साथ-साथ अनेक लोग तो चल पड़े! रुककर मंच की तरफ देखा तक नहीं! उन्हीं के लिए तो वह फिर से मंच पर आई थी। पर जब उन्हें देखना नहीं था तो…
उसके अंदर एक टीस उठी, पर उसे भी उसने जाहिर न होने दिया क्योंकि अन्य लोग प्रशंसा भाव से उनके नृत्य को देख रहे थे। नृत्य समाप्त हुआ।
वह नीचे उतरी। अब उसे अपने पैर थोड़े लड़खड़ाते हुए से महसूस हुए। सूखे होंठ का एहसास हुआ। उसने अपने होठों पर जीभ फेरकर उन्हें कुछ राहत देने की कोशिश की। उसने पर्दे के पीछे रखे अपने बैग से अपनी बोतल निकाली। देखा- उसमें तो बस दो-चार घूँट पानी ही बचा था। सुबह से अब तक आखिर उसी ने तो जान बचाई थी! बचे हुए पानी से उसने अपने गले को तर किया।
थोड़ी देर बाद कार्यक्रम के समापन की घोषणा हुई और साथ ही उन्हें रिफ्रेशमेंट लेकर ही घर जाने की बात कही गई। उसे बड़ी जोर की भूख लगी थी। वह थोड़ी आश्वस्त हुई कि चलो कुछ तो पेट में जाएगा! घर पहुँचने तक का इंतज़ाम बहुत ज़रूरी लग रहा था। वह उस स्थान पर पहुँची जहाँ बच्चों को रिफ्रेशमेंट बाँटी जा रही थी। उसे और उसकी टीम को एक-एक पाँच-पाँच रुपए वाले छोटे बिस्कुट के पैकेट हाथ में पकड़ा दिए गए। उसे देख उसकी आँखें सजल हो उठीं। उसके बगल में ही एक अन्य क्लास की बच्ची खड़ी थी। जब उस बच्ची ने रिफ्रेशमेंट बाँटने के तरीके को दिखा तो वह यह कहकर चली गई- ‘कोई बात नहीं! मुझे नहीं चाहिए।’ …क्योंकि उसका भी हिसाब दिया जाना था… बिस्कुट के एक छोटे-से पैकेट के लिए उसे अपनी क्लास टीचर को बुलाना पड़ता। उसने तो कह दिया कि उसे नहीं चाहिए, पर भला मेघा क्या करती? उसे तो जोर की भूख लगी थी, थकी हुई भी थी। उसे तो उस पैकेट में भी बड़ा आसरा दिख रहा था। साथ ही उसके क्लास टीचर वहाँ थे ही। उस शर्त की दिक्कत उसके लिए थी नहीं। उसने हाथ बढ़ाकर अपने हिस्से का वह बेशकीमती पैकेट ले लिया।
मेघा और दीया, दोनों सहेलियाँ पास में ही एक पेड़ की छाँव में बैठकर खाने लगीं। थकान इतनी थी कि यह भी हिम्मत नहीं हो रही थी कि चलते-चलते खाया जाए। दीया ने उसे अपनी बोतल से पानी दिया। बिस्कुट खाने के बाद पानी पी लेने से उसे बड़ी राहत मिली।
वे घर जाने के लिए उठ ही रहे थे कि उसकी नज़र स्कूल के एक ओर गई। कुछ ही दूरी पर गरम-गरम पूरी तली जा रही थी। अब तक तो उसका ध्यान ही नहीं गया था! पूरी-सब्जी की खुशबू तो वहाँ तक आ रही थी। अरे! यह इंतज़ाम किसके लिए? पता चला कि वह तो शिक्षकों और अतिथियों के लिए था।
उसका ध्यान एक बार की सुनी हुई चर्चा पर गया। चर्चा में शामिल बड़े लोग कह रहे थे कि विद्यालय बच्चों के लिए होता है; वहाँ बच्चे ही पूरी व्यवस्था और कार्यक्रम के केंद्र में होते हैं; हर योजना बच्चों को केंद्र में रखकर बनाई जाती है। वह अपने हाथ में बचे हुए बिस्कुट के दो-तीन पीस को देखकर फिर से पूरी-सब्जी की ओर देखने लगी। पर वह अपनी सीमा जानती थी। वह वहाँ जाकर हाथ नहीं पसार सकती थी। अनधिकार माँगना ठीक भी नहीं लगता! उस पर उसे आशंका यह भी थी कि डांटी जाएगी; दुत्कारी भी जा सकती है क्योंकि यही सब तो वह देखती आई है। उसने अपने बचे हुए बिस्कुट ख़त्म किए। दीया के हाथ से पानी की बोतल ली और उसमें बचा हुआ पानी भी ख़त्म कर डाला। प्यास बुझी नहीं। तो फिर… और पानी की चाहत में वह स्कूल में लगे नल की तरफ बढ़ी, पानी भरा और गटागट लगभग आधी बोतल खाली कर दी। चलते-चलते उसकी नज़र पड़ी कि पानी की कुछ सील-बंद बोतलें उस पूरी-सब्ज़ी वाली टेबल के बगल वाली टेबल पर रखी हुई थीं।
वह फिर से विचारों में खो गई- ‘जब हमें कहा जाता है कि इस नल में RO का पानी आता है, हम इसे पी सकते हैं, तो यह सील-बंद पानी की बोतलें किसके लिए और क्यों?’ …
‘हाँ, पैसे आते हैं, बच्चों के लिए आते हैं। पर…’
‘नहीं-नहीं!, हमारे शिक्षक ऐसा नहीं कर सकते। उन्होंने अपने पैसों से यह इंतज़ाम किया होगा।’
फिर भी प्रश्न तो उठता है- ‘क्या वह पानी जो हमारे लिए शुद्ध है वह इनके लिए नहीं है? जो रिफ्रेशमेंट हमारे लिए सफिशिएंट है क्या वह उनके लिए नहीं है?’ बस इन्हीं विचारों में खोई हुई वह धीमे कदमों से दीया के पास आई, और दोनों घर की तरफ चल पड़े। सवाल उसके मन में घूमते रहे।
दीया ने उसे टोका, “क्या बात है मेघा? कहाँ खोई हुई हो? क्या सोच रही हो?”
उसी अन्यमयस्क अवस्था में मेघा के मुँह से निकला, “हम और वे अलग हैं…किसी दिन यदि मैं भी कोई अधिकारी, प्रिंसिपल या टीचर बन जाऊंगी तो क्या मैं भी…”
और न जाने उसने और क्या-क्या कहा या केवल उसके होंठ हिले, पर दीया कुछ और सुन नहीं पाई।



Comments