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हाँ हम तो खुशीबाज़ हैं

हाँ हम तो जनम से ही खुशीबाज़ हैं । चैत और बैसाख के भोर में जब बागीचे में महुआ बीनने जाते थे तो हमको ये पता भी नहीं रहता था कि इस महुआ का क्या उपयोग होगा पर दौड़-दौड़ के बीनते थे क्योंकि बहुत मज़ा आता था । अब पता चला कि यह मजा ही खुशीबाज़ी थी ।

घर में गाय-भैंस जरूर रहा करते थे, सुबह उनके नाद में भूसा इत्यादि डालकर हरा चारा के लिए खेत में जाना रहता था । हम जाएँ ही इसके लिए घर के लोगों का कोई दबाव नहीं था फिर भी जाते थे क्योंकि खेत में जाने का और फिर वह हरा चारा घर लाकर मशीन में काटने का मजा ही कुछ और था और हम तो मजा के लिए ही सबकुछ करते थे, इससे ही अनुमान बन रहा है कि हम जनम से खुशीबाज़ हैं।


जब चाचा जी गाय का दूध निकालते तो हमको गाय के थान से सीधे दूध पिला देते थे, दूध की बौछार कुछ मुँह के अंदर जाती तो कुछ मुँह के ऊपर लेकिन वास्तव में बहुत मजा आता था । गाय का बछड़ा हमको टुकुर-टुकुर देखता रहता क्योंकि उसका हिस्सा जो हम हड़प रहे थे ।


खलिहान के किनारे कुछ बालू वाली जमीन हुआ करती थी, हम बच्चे लोग उसमें अपना-अपना पैर घुसाकर बालू का घर बनाते, फिर एक दूसरे के घर को तोड़ देते थे । बड़ी गुत्थम- गुत्था कुश्ती होती अंत में किसी का घर बचता नहीं था सारा घर गिर जाने के बाद सब के सब खुश हो जाते थे । अब सोचते हैं कि ऐसा क्यों करते थे तो कुछ कारण पकड़ में नहीं आता है सिवाय मजा के । तो क्या हम सही में बचपन से ही खुशीबाज़ हैं?

ठंडी के दोपहर में खेत में जाकर मटर, चना और अरहर की छीमी (फली) नोच- नोच कर खाते थे न कोई डर था न कोई संशय । गन्ना के खेत में एक बार हाथ लग गया तो तीन चार गन्ना खाकर ही शान्ति मिलती, मुँह के किनारे फट जाते थे पर गन्ना छूटता नहीं था । अगर कहीं पम्पिंग सेट से खेत में पानी चलता मिले तो हौज़ में नहाकर सारा थकान मिट जाती थी लेकिन बच्चे उस हौज़ में भी अपने शरारत से बाज़ नहीं आते । अब तो आपको लग ही गया होगा की हम शुरू से ही कितने खुशीबाज़ हैं ।


खलिहान में अरहर और गेहूँ के राशि(ढेर) पर चादर बिछाकर सोने के लिए बड़ी लड़ाई होती थी । घर वाले जाने ही नहीं देते कि तुम अभी बच्चे हो डर जाओगे । लेकिन किसी प्रकार जुगाड़ भिड़ा के चले जाते थे । गेहूँ के ढेर पर सोने का मजा अब कोई हमसे पूछे तो बता नहीं पायेंगे, क्योंकि उस मजा के लिए तो फिर से खलिहान में जाना होगा । भैंस के पीठ पर सवारी करने के चक्कर में न जाने कितना बार गिरे पर हम भी अपना आदत नहीं छोड़े कितना भी डाँट खाएँ पर फिर वही काम करते थे, क्योंकि मुझे तो उसी में मजा आता था भाई ।

सोचता हूँ कि सुविधा जुटाने के इस भाग दौड़ की जिन्दगी में वह खुशी जाने कहाँ गुम हो गयी है, सम्बन्ध न जाने कहाँ खो गए । अब फिर से आदमी और उनसे सम्बन्ध को खोज(ढूँढ) रहा हूँ, शायद फिर वह खुशी दुगुना होकर मिलना शुरू हो जाये ।

 
 
 

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