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सदा सुखी रहो!

“सदा सुखी रहो!” यह आशीर्वचन हमने खूब पाया भी और दिया भी। पर क्या अपनी और दूसरों की ज़िंदगी में सुख सुनिश्चित हुआ?


संबंधों में घुटन और परिवारों में टूटन के मामले भरे पड़े हैं। सभी की शुभभावनाओं और शुभकामनाओं के बावज़ूद ऐसी स्थिति क्यों है? क्या परिवार में पैसे और संसाधनों की कमी इसका कारण है? यदि ऐसा है तो साधन संपन्न अमीर परिवारों में ऐसी स्थिति क्यों आती है? यहाँ तक कि वो परिवार जो कभी विपन्नता में मुस्कुराकर जी चुके हों, उनमें से अनेक सम्पन्नता आने के बाद बिखराव में क्यों चले जाते हैं? या फिर यह समय के साथ उठने और गिरने वाला मामला है? क्या हम इस टूटन और बिखराव के मूल कारण को पहचानकर उसका हल ढूँढ पाएंगे या यह यूँ ही चलता रहेगा? 


सोचना तो होगा! हर व्यक्ति खुश रहना चाहता है और दूसरे को दुखी करना उसका उद्देश्य नहीं होता; फिर भी ऐसा क्यों होता है कि अपनों के बीच और अपनों के कारण ही ज़्यादातर लोग दुखी होते पाए जाते हैं? ये सारे विचार के मुद्दे हैं। मेरे खुद के लिए भी और मेरे साथ इस धरा पर जीने वाले हर व्यक्ति के लिए। जवाब न ढूँढा, यदि समस्या के मूल कारण तक न पहुँचे तो वर्तमान पीढ़ी भी दुखी होगी और अपनी वही कमियाँ अगली पीढ़ी को भी झेलते हुए जीने के लिए दे जाएगी।


जहाँ तक मेरा ध्यान जाता है, भौतिक वस्तु उतना बड़ा मुद्दा है ही नहीं। मामला समझ का है। तो समझदार होना क्या है? यहाँ भी पेंच फंसता नज़र आता है। प्रौढ़ और बुजुर्ग का दावा होता है कि वह अनुभवी है, उसके बाल धूप में सफेद नहीं हुए; युवा कहता है जमाना बदल गया है, आपकी बातें पुरानी हो गई हैं और मैं अब बच्चा नहीं रहा, तो आज का बच्चा कहता है - ‘आपलोग ज्ञान मत दीजिए। हम जानते हैं क्या सही और क्या ग़लत है। आज तकनीक का जमाना है। आपके ज्ञान की पहुँच से कहीं ज़्यादा हमारी मुट्ठी में है।’ पर ये अनुभव के दावे, ये ज्ञान के भंडार वास्तव में ज़िंदगी को संवारने में असफल क्यों हो रहे हैं?


देखना होगा…अटकाव कहाँ है? ध्यान जाता है- क्या मैंने खुद को ठीक से जाना है? क्या मैंने सामने वाले को ठीक से समझा है? खुद को जानना मतलब मेरे वास्तविक स्वरूप को, मेरे शरीर और मन के संयुक्त उपस्थिति को। क्या गौर किया कि शरीर की आवश्यकताओं और मन की आवश्यकताओं में भिन्नता है? …और उनकी पूर्ति के तरीके में भी मुझे अंतर दिखता है क्या? आराम शरीर का मामला है, सुख मन का। आराम की वस्तु में सुख तलाशेंगे तो वह कभी पूरा पड़ेगा नहीं, और मन के प्रसन्न होने से, विपरीत मौसम का प्रभाव शरीर पर नहीं आएगा यह भी नहीं होगा। 


ऐसे में सबसे बड़ा अटकाव है स्वयं को समझदार मानने का भ्रम। हर व्यक्ति यह माने हुए जब जीता है कि वह जो जानता है, वह जैसा सोचता है वही सत्य है, वही सही है, तो लोग अपने-अपने सही और एक दृष्टीय सत्य के साथ आपस में टकराते हैं। सही मायने में एक मानव के रूप में स्वयं को और इस अस्तित्व की व्यवस्था को जानना ही समाधान है। अतः प्रस्ताव है कि सब इसके लिए समुचित वक़्त लगाएँ। यह ठीक वैसा ही है जैसे हमने जिस मशीन की संरचना, क्रियाविधि और उपयोगिता को ठीक से जान लिया उसकी हैंडलिंग हमारे लिए समस्या नहीं रह जाती। यह बात इंसान द्वारा पेड़-पौधों और अन्य जीवों की हैंडलिंग में भी देखी जा सकती है। देखें तो प्रधानतः कमाने योग्य तैयार होने के लिए हम कितने वर्ष शिक्षा के नाम पर लगा देते हैं, पर जो समझ सुखपूर्वक जीने के काम आएगी, आपसी तालमेल को सुनिश्चित करेगी, वह वर्तमान शिक्षा में नदारद है या प्रभावहीन है… और उसके लिए हम अलग से समय लगाने को भी तैयार नहीं!


कहते हैं- जिसकी अपने से बात हो गई, मानो उसकी अपनों से बात हो गई। ऐसा क्यों? क्योंकि मन की प्रकृति एक समान है। मेरी बात सीधे मानिए मत; जाँचकर देखिए। स्वयं में देखें। सामने वाले को ऑब्जर्व करें। ज़िंदगी की घटनाओं का ईमानदारी से विश्लेषण करके देखें। ‘क्यों’ का सवाल उठाते हुए घटना/व्यवहार के मूल कारण/आधार तक पहुँचने का प्रयास किया जाए। 


मानव प्रकृति की एक इकाई है। उसके होने तथा रहने का एक मैकेनिज्म है। उसे पहचाने बिना भला काम कैसे चलेगा! अब देखिए न, क्या हम सबके साथ ऐसा कभी नहीं हुआ है कि हमने जिससे जुड़ाव महसूस किया उसकी छोटी-सी या कम कीमत की भेंट हमें कितनी प्यारी लगती है, उसकी गलतियाँ हमें उसे ठीक होने में सहयोग करने का अवसर दिखती हैं, पर जिससे हम जुड़ाव महसूस नहीं करते उसके कीमती तोहफे में भी प्रायः नुक्स दिख ही जाता है, उसकी छोटी-सी भी ग़लती जानबूझकर किया गया हमारा बड़ा नुकसान दिखता है।


तो, जो मैं आज प्रस्ताव रूप में बात रखना चाहता हूँ, वह है कि थोड़ा वक़्त अपने मन को भी ठीक से समझने के लिए लगाया जाए। एक बार ठीक से खुद को समझ लिया तो फिर सामने वाले को भी ठीक से जान पाएंगे क्योंकि वह सामने वाला भी मूल रूप से मेरे जैसा ही है। उसे भी मेरी तरह विश्वास, सम्मान, स्नेह चाहिए, और इनके बिना कोई भी संबंध जो होगा, वह मात्र नाम के लिए होगा। 


जीवन विद्या में एक सूत्र है -


“संबंध है तो शोषण नहीं,

शोषण है तो संबंध नहीं।”


तात्पर्य है कि यदि मैंने किसी को अपने संबंधी के रूप में स्वीकार लिया है तो मैं उसका अहित सोच भी नहीं सकता, बल्कि उसके लिए कुछ करने की तमन्ना होती है; उसकी उन्नति, उसकी समृद्धि, उसकी खुशी के लिए कुछ करने का मन करता है। साथ ही यह सूत्र एक चेक प्वाइंट देता है कि यदि कहीं किसी कारण किसी के भाव पक्ष का तिरस्कार मेरे द्वारा हो रहा है इसका मतलब मैंने उसके साथ अपने संबंध को पहचाना ही नहीं है। 


यदि संबंध को मैंने ठीक-ठीक पहचान लिया तो मैं देकर सुखी होने को तत्पर होता हूँ। सोचकर देखिए जिन दो लोगों के बीच जीने की बात हो, वे दोनों ही जब दूसरे को देकर यानी एक-दूसरे की बेहतरी के अर्थ में कुछ करने को तत्पर होंगे, तो वहाँ शोषण होगा क्या? पर ध्यान रहे यहाँ भौतिक वस्तु के रूप में देने की बात नहीं है, यहाँ मूल बात भाव की है, यानी स्नेह, सम्मान, कृतज्ञता आदि की। जब यह बात स्पष्ट रूप से अपने अंदर टिक जाएगी, भौतिक वस्तु मुद्दा बनेगा ही नहीं। उस मामले में भी दोनों में एक-दूसरे के लिए न्योछावर करने की प्रवृत्ति स्वतः दिखेगी ही। ऐसा मैंने अपनी ऑब्जर्वेशन में पाया है। यह पूरा विश्लेषण ध्यानाकर्षण मात्र है इस अर्थ में कि हम सभी स्वयं के अंदर चलने वाली क्रियाओं के मूल को देखने की ओर बढ़ें। 


बहुत सारी बातें हैं…सोचें…संबंधों को ठीक तरह से न समझने के कारण इस अनमोल जीवन के अनमोल पलों को और अपने जीवन में आए प्यारे संबंधियों के साथ सुखपूर्वक जीने के अवसर को कहीं हम खो न दें! साथ ही जिस अगली पीढ़ी को हमने हमेशा सुखपूर्वक जीने का आशीर्वाद दिया, हम कहीं विरासत में उन्हें दुखी होकर जीने की नासमझी उपहार स्वरूप न दे जाएँ!  

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