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बातें

मैं बातें खूब करता हूँ और बहुत अच्छी करता हूँ। शिक्षक हो जाने में मेरे इस गुण की सार्थकता दिखती है। चलिए मेरी अनेक बातों में से आपको एक बात बताता हूँ।


मुझे अपने नए स्कूल में आए हुए अभी कुछ ही दिन हुए थे। उन कुछ दिनों में मेरे प्राचार्य महोदय को यह पता चल गया था कि यह बोलता अच्छा है और मंच पर जाने में इसे हिचक भी नहीं। उन्होंने इसी भरोसे पर एक दिन मेरे सुबह स्कूल पहुँचते ही एक ज़िम्मेदारी सौंपी। विभाग की ओर से एक आदेश आया था कि हाथ की सफाई के बारे में विद्यार्थियों को जागरूक किया जाए। नहीं-नहीं! दूसरों को धोखा देने वाली हाथ की सफाई नहीं, यह तो गंदगी से मुक्ति दिलाने वाली सफाई की बात थी। उन्होंने मुझे वह सर्कुलर थमाते हुए कहा, “इसे जल्दी से देख लीजिए। इसमें हाथ धोने संबंधी जानकारी और प्रक्रिया भी दे रखी है। इससे आपको आसानी होगी। यह सब आज बच्चों को असेंबली में बताना है।”


मैंने उनका भरोसा पूरा बनाए रखा। प्रार्थना का समय होने ही वाला था। मैंने जल्दी-जल्दी दिए हुए इंस्ट्रक्शंस और स्टेप्स पढ़े। प्रार्थना हो जाने के बाद मैं मंच पर चढ़ा। अपनी बातों का जाल बुनते हुए सबको हाथ धोने की सही प्रक्रिया जानने तक ले आया। मैंने प्रक्रिया का वर्णन शुरू किया- “ध्यान से देखिए और जानिए, समझिए! यह हाथ हमारी अनेक बीमारियों का माध्यम बनता है। हमारे हाथ यदि ठीक से साफ न हों तो उसमें चिपके जीवाणु, कीटाणु भोजन के साथ हमारे मुँह में चले जाते हैं। हमें इससे बचना है। तो क्या करें? शौच से आने के बाद और भोजन करने से पहले हाथ साबुन से अवश्य धोएँ। हाथ धोने के पीछे पूरा विज्ञान है। समझेंगे तो ग़लती नहीं होगी। यह ग़लती नहीं होगी तो आपके स्वस्थ रहने में योगदान होगा। तो देखिए… जब भी आप हाथ धोएँ तो उसका तरीका इस प्रकार है। पहले आप अपने हाथ को गीला कर लें। दाएँ हाथ से साबुन की टिकिया उठाएँ और बाएँ हाथ के पीछे यूँ रगड़ें। उसके बाद टिकिया को जरा धोकर वापस डब्बे में डाल दें। अब बाएँ हाथ के पीछे लगे साबुन को दाएँ हाथ से रगड़ते हुए झाग बनाएँ और दोनों हाथों को बढ़िया से मलें, उंगलियों के बीच में, नाखूनों के अंदर कुछ इस तरह…उसके बाद पानी से धो लें। वैसे अब तो लिक्विड सोप का इस्तेमाल होने लगा है। ऐसे में क्या बाएँ हाथ के पीछे की ओर ही वह डालना होगा?” ऐसी तार्किक बातें चलीं। यह सब बताने के बाद बच्चों से उससे संबंधित एक-दो प्रश्न किए और बात पहुँच जाने की प्रसन्नता लिए मैं मंच पर से उतरा।


उसी दिन की आगे की यह घटना है। मेरे पास लाइब्रेरी का चार्ज था। लाइब्रेरी पहली मंजिल पर थी। मैंने कुछ बच्चों की मदद से लाइब्रेरी को व्यवस्थित किया। हाथ गंदे हो गए थे। मैं अपने हाथ धोने के लिए नीचे लगे नल के पास पहुँचा। मैं अपनी साबुन की टिकिया लेकर गया था। मैंने नल खोला। हाथ गीले किए। साबुन की टिकिया उठाई, और हथेलियों के बीच रगड़ना शुरू किया। वहीं एक बच्चे ने मुझे देखते हुए मुस्कुराकर बस इतना ही कहा, “सर!” उसके बोलने के अंदाज़ और उद्देश्य से मैं झेंप गया। अपने बचाव में मेरे मुँह से बस इतना निकला, “यह शौच की बाद वाली सफाई नहीं है न!” 


पर उसकी मुस्कुराहट बता रही थी कि नुकसान तो हो गया था…मेरे स्वास्थ्य का तो जो हुआ होगा वह तो छोटी बात…बड़ा नुकसान मेरी इमेज का हुआ था। उसकी आँखें, मुस्कुराहट और ‘सर’ बोलने के अंदाज़ ने बता दिया था और जता दिया था कि मैं बोलने बताने में अच्छा हो सकता हूँ पर मेरे भेजे में भी वह सफाई का विज्ञान टिका नहीं था। ‘बोलता कुछ और हूँ और जीता किसी और तरीके से।’


पर उसका लाभ यह हुआ कि अब मैं थोड़ा ज़्यादा सावधान रहने की कोशिश करता हूँ। यह देखता हूँ कि जीने की जो बात मैं दूसरों को बताता हूँ वह अपने जीने में है भी या नहीं! भला हो उस बच्चे का जो मेरा इतना बड़ा भला कर गया!

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