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शिक्षा की नजर में - शिक्षा क्यों और कैसी हो?

Jul 14, 2020
3 min read

Updated: Jul 19, 2020

प्रिय शिक्षक !


सभ्य समाज का निर्माण करना ही शिक्षा का मूल उद्देश्य है तथा आप सभी इसी दिशा में प्रयासरत हैं। तकनीकी के बढ़ते प्रयोग ने सामाजिक व्यवस्था को एक नए प्रारूप में नए नज़रिए से देखने व समझने की ओर इंगित किया है। इसके सुपरिणामों व दुष्परिणामों के साथ सामंजस्य बिठाने की चुनौती हमारे सामने है तथा इसे विधिवत रूप से बच्चों के सामने रखना व समझाना शिक्षा व अध्यापक की जिम्मेदारी व जवाबदेही बनती ही है क्योंकि हर नए बदलाव की डगर विद्यालय से हो कर ही गुजरनी है तथा शिक्षक हमेशा ही इसके केन्द्र बिन्दु में बना ही रहेगा। जब भी समाज में कुरीतियों नें अपनी जगह बनाई है कहीं ना कहीं शिक्षा को इसके लिए दोषी माना गया है। मानव का मानव के साथ व्यवहार हमेशा ही शिक्षा के मापदंडों व मानदंडों का दर्पण रहा है । आज जब चारों और मशीनों का बोलबाला है तथा शिक्षक से ज्यादा जब मशीनों पर विश्वास हो चला है तो इस विषय पर गम्भीरता से सोचने की जरूरत हैं। जब व्यक्ति अपने ज्ञानोर्जन व मनोरंजन के लिए मानव से ज्यादा मशीनों के साथ सुखपूर्वक महसूस करता हो तो मानव की मानव के लिए उपयोगिता पर अत्यंत गम्भीर प्रश्न है। शिक्षक का हर दिन नित् नई चुनौतियों के साथ साथ सार्थक आशाओं व उम्मीदों के साथ पेश होता रहेगा। सामाजिक उम्मीदों व चुनौतियों के अनुरूप अपने बच्चों को तैयार करना शिक्षा व शिक्षक की मूलभूत आशातीत जिम्मेदारी है और बनी रहेगी। आज ये पत्र बड़े ही व्यथित मन से लिख रही हूँ। हर रोज अखबारों व समाचारों में दुराचार की घटनाओं ने मुझे झझकौर दिया है। तुम्हारा मन भी विचलित होगा। वो व्यक्ति जो इस कुकृत्य को करता है वो कुछ महत्वपूर्ण सालों तक हमारे पास भी रहा है और वह स्कूली शिक्षा के साल उसके व्यक्तित्व निर्माण के महत्वपूर्ण साल होते हैं । मैं सोचती हूं उन महत्वपूर्ण सालों में उसे स्कूल से क्या मिला, क्या वही तो नहीं मिला जो आज वह कर रहा है ?


मानती हूं यह सरासर मैं खुद पर ,तुम पर और विद्यालय शिक्षा पर दोषारोपण कर रही हूं परंतु क्या करूं शिक्षा होकर उसकी जिम्मेदारी खुद पर नहीं लूंगी तो आने वाली नई पीढ़ी को क्या दूंगी । क्या यह प्रश्न ऐसे ही मुंह खोले हमारी तरफ ताकते रहेंगे और हम बेबस बने देखते रहेंगे ?


सामाजिक सरोकार शिक्षा के सरोकार क्यों नहीं बन पाते यह सोचने की जरूरत है । घर का वातावरण , स्कूल का वातावरण , काम का वातावरण , आने जाने का वातावरण , क्यों इतना असुरक्षित हो गया है ? बच्चे और बच्चियां घर में भी सुरक्षित नहीं ?, विद्यालय में भी सुरक्षित नहीं ? , काम की जगह भी सुरक्षित नहीं ?, आते जाते भी सुरक्षित नहीं ? क्या होगा ऐसे समाज का जहां जीने की जगह ही ना हो और हर वक्त हम एक दूसरे पर अविश्वास की भावना के व्यवहार करते रहे । कैसे यह विश्वास कायम हो ? कैसे स्कूली शिक्षा उपयोगी हो । कैसे हमारे सुव्यवहार के भाव सुदृढ़ हों? क्या सोचने लगे?

कुछ गलत कहा मैने!


अब क्या करें हमने शिक्षा से साक्षरता का सफर तो तय कर लिया है अब हमें शिक्षा से विद्या का सफर तय करना है हमें नैतिक मूल्यों को वहन करने वाले मानव का निर्माण करना होगा I अपने पढ़ने पढ़ाने, सीखने-सिखाने, समझने-समझाने में नैतिक मूल्यों को जगह देनी होगी तथा उन्हें अपने कार्यकलापों में परिलक्षित करना होगा I


समाज को मुझसे और तुमसे बहुत सी आशाएं हैं । हम सदा सही काम करेंगे और हर कसौटी पर खरे उतरेंगे यही तुम्हारे और मेरे होने की सबसे बड़ी उपयोगिता है जिससे हम आने वाले समाज को अपने ज्ञान से तथा व्यवहार से प्रकाशित करेंगे I हम सदा यही प्रयास करेंगे कि शिक्षा सदा जोड़ने का काम करें ना कि खंडित करने का।


सदा मानव के उत्थान की चाह में

शिक्षा



 
 
 

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