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शिक्षा और गुरु-शिष्य संबंध

आज शिक्षक दिवस है I

शिक्षक दिवस, शिक्षकों के सम्मान के रूप में मनाया जाता हैI यह भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के जन्म दिवस के अवसर पर मनाया जाता है।

आज मैं साझा करना चाहूंगी कि शिक्षा का मूल उद्देश्य क्या है? शिक्षा की वस्तु क्या हो? शिक्षक क्यों चाहिए? शिक्षक और छात्र का संबंध कैसा हो?


शिक्षा का मूल उद्देश्य क्या है?

  • मुझे लगता है कि शिक्षा का मूल उद्देश्य है, कि प्रत्येक विद्यार्थी एकाकी या पारिवारिक ही न रहे आगे बढ़कर व्यवहारिक रूप में पूरकता पूर्वक सामाजिक हो पाए।

  • शिक्षा का दूसरा उद्देश्य यह है कि विद्यार्थी स्वावलंबी (अपने पैरों पर खड़ा हो पाए) होकर अपने परिवार का भरण पोषण करने लायक बन पाए।

  • शिक्षा का तीसरा उद्देश्य मेरी समझ में यह हो सकता है कि विद्यार्थी अपना जीवन विश्वास पूर्वक जी पाए, स्वयं पर विश्वास रख पाए और दूसरों के साथ भी विश्वासपूर्वक जी पाए।

  • जैसे की हम सभी ने महसूस किया होगा कि संबंधों में विश्वास मूल्य आधार मूल्य के रूप में पहचाना गया है। बिना विश्वास रूपी आधार के तो कोई भी संबंध ना तो पहचाना जा सकता है ना ही उसका निर्वाह किया जा सकता है तो न्याय तो घटित होगा ही नहीं। फलस्वरूप मनुष्य का दुखी रहना तय है।

  • शिक्षा का एक मूल उद्देश्य यह भी है कि विद्यार्थी के व्यक्तित्व और उसकी प्रतिभा में संतुलन स्थापित हो पाए।


शिक्षक और शिष्य का संबंध कैसा हो?

अगर हम शिष्य को देखें तो वह जिज्ञासु होता हैI शिष्य को जिज्ञासा होती है जानने की, समझने की इसलिए वह बार-बार प्रश्न करता है शिक्षक प्रयास करते हैं कि शिष्य की जिज्ञासा शांत हो पाए।

बच्चा सत्य वक्ता होता है, किन्तु हम देखते हैं कि धीरे-धीरे उसका सत्य वक्ता होना छूट जाता है और वह सत्य से दूर होता चला जाता है। तो उसकी सत्यवक्ता होने स्थिति कैसे बनाई रखी जाए यह भी शिक्षा का एक अभिन्न अंग और शिक्षक का दायित्व भी ।

बच्चा न्याय का याचक होता है और न्याय करना चाहता है लेकिन न्याय प्रदान करने की क्षमता उसके पास नहीं होती। यह भी शिक्षक का उद्देश्य है कि बच्चा कैसे न्याय प्रदान करने की क्षमता प्राप्त कर पाए।

शिष्य गुरु के साथ विश्वास मूल्य के निर्वाह की निरंतरता के साथ होता है और शिक्षक के प्रति उसके मन में गौरव, कृतज्ञता, सम्मान और प्रेम का भाव हम देख पाते हैं। यहां तक की विद्यार्थी शिक्षक से इतना प्रेम करते हैं कि वह अपने मां-बाप की बात को भी अनसुना कर देते हैं लेकिन अपनी शिक्षक की बात को अनसुना नहीं करते। इसके पीछे कारण बच्चे का गुरु के प्रति गौरव और कृतज्ञता का भाव होना होता है। शिष्य की गुरु से यह अपेक्षा होती है कि गुरु उसकी जिज्ञासा को शांत कर पाए और शिक्षक का यह दायित्व है कि वह विद्यार्थी की मौलिकत्ता (सत्यवक्ता,जिज्ञासु,न्याय का याचक होना) को बनाए रखने में सहायक होंI


अब यदि हम गुरु को देखें तो गुरु अपने शिष्य की जिज्ञासाओं को शांत करना चाहते हैं। विद्यार्थी जो सत्य वक्ता होता है उसको उसी रूप में रख पाने में सक्षम होने का प्रयास करते हैं। शिक्षक विद्यार्थी के साथ विश्वास मूल्य के निर्वाह की निरंतरता के साथ होते हैं। विद्यार्थी के साथ प्रस्तुत होने के लिए उसमें, प्रेम, वात्सल्य का भाव बना रहता है इस रूप में हम शिक्षक को देख पाते हैं। यह भी देखने को मिल जाता है कि गुरु शिष्य को पुत्रवत प्रेम करते हैं और शिष्य भी उनकी श्रेष्ठता का सम्मान कर गुरु के प्रति कृतज्ञता के भाव के साथ होते हैं।


आज मैं अपने सभी गुरुजनों को कृतज्ञता ज्ञापित करती हूँ कि उन्होंने न केवल मुझे पढ़ाया है वरन मुझे पढ़ा भी है और कई बार बिना मेरे कहे, मेरी जिज्ञासाओं को भी शांत किया हैI आज भी मैं स्वयं को एक विद्यार्थी मानती हूँ और आज भी मैं सीखने की प्रक्रिया में हूँ मैं निरंतर अपने साथियों, सहयोगियों और परिजनों से कुछ न कुछ सीखती रहती हूँ





 
 
 

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