top of page

लाड़-प्यार की कीमत

Jun 24
2 min read

यह कहानी हमारे ही मोहल्ले की है, जहाँ एक परिवार रहता है। लॉकडाउन से पहले वे लोग बहुत खुश थे और हँसी-खुशी अपनी ज़िंदगी जी रहे थे। उनके घर में एक छह साल का छोटा बच्चा था, जो पूरे घर की जान था।

​जब लॉकडाउन लगा, तो सब कुछ बंद हो गया। उस समय वह बच्चा घर में बैठे-बैठे बहुत ज़्यादा मैदे से बनी चाऊमीन और मोमोज़ खाने लगा। हर रोज़ उसकी यही ज़िद रहती थी और घर वाले भी लाड़-प्यार में उसे खिला देते थे। लेकिन किसी को अंदाज़ा नहीं था कि यह बाहर का खाना अंदर ही अंदर उसे कितना नुकसान पहुँचा रहा है।


​एक रात अचानक उसके पेट में बहुत तेज़ दर्द उठा। वह दर्द से बुरी तरह तड़पने लगा। उसकी हालत देखकर परिवार के लोग घबरा गए और आधी रात को ही उसे अस्पताल लेकर भागे। वहाँ डॉक्टरों ने उसकी जाँच करने के बाद परिवार वालों से कहा, "इसके पेट में बहुत ज़्यादा इन्फेक्शन (संक्रमण) हो गया है, हमें इसका तुरंत ऑपरेशन करना होगा।"


​यह सुनकर घरवालों के होश उड़ गए। उन्होंने रोते हुए डॉक्टर से कहा, "डॉक्टर साहब, आप जल्दी से ऑपरेशन कर दीजिए। हमारे पास जितने पैसे हैं हम सब लगा देंगे, बस हमारे बच्चे को बचा लीजिए।" डॉक्टरों ने तुरंत उसका ऑपरेशन किया और उसे करीब एक हफ्ते तक अस्पताल में ही भर्ती रखा।


​एक हफ्ते बाद जब उसकी तबीयत थोड़ी ठीक हुई, तो डॉक्टरों ने उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी। सबने राहत की साँस ली कि बच्चा ठीक होकर घर आ गया। पर किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। उसी रात अचानक फिर से उसके पेट में बहुत तेज़ दर्द उठा। इस बार दर्द इतना भयानक था कि जब तक लोग कुछ समझ पाते या उसे दोबारा अस्पताल ले जाते, उसने दम तोड़ दिया।


​इस घटना के बाद उसके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। घर के सभी सदस्य फूट-फूटकर रोने लगे। लाड़-प्यार में केवल स्वाद के लिए कुछ भी खिलाते चले जाना आज उन्हें बहुत अखर रहा था। पर अब उनके पास अफसोस के सिवाय कुछ न बचा था। रोते-रोते उनके मुँह से बस यही निकल रहा था, "हमारा सब कुछ खत्म हो गया! हमारे सारे पैसे भी चले गए और हमारा बच्चा भी हमारे पास नहीं रहा।"



Recent Posts

See All
जलवा

मास्टर जी जैसे ही क्लास के सामने पहुँचे, वे अचंभित! उन्होंने जो देखा और जो महसूस किया उसका पूरा वर्णन शब्दों में समा पाएगा ऐसा लग नहीं रहा। यहाँ आपकी कल्पनाशक्ति ही आपके काम आएगी। खैर! कोशिश करता हूँ

 
 
 
गधा

अपने 11 वर्ष की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते न जाने कई बार उसने लोगों के मुँह से अपने लिए ‘गधा’ संबोधन सुना होगा। ‘ओए गधे! सुनता नहीं है।’ ‘गधे! तुमसे नहीं होगा।’ ‘गधा कहीं का! तुझे इतनी सी बात समझ नहीं

 
 
 
नौवीं फेल

नौवीं कक्षा का मासूम बबलू एक नम्र निवेदन लेकर प्रिंसिपल ऑफिस में पहुँचा। बबलू ने कहा, “सर, मुझे स्कूल से मत निकालिए। मुझे NIOS (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग) में मत डालिए। मैं तीसरी बार फेल नहीं

 
 
 

Comments

Rated 0 out of 5 stars.
No ratings yet

Add a rating
bottom of page