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लाड़-प्यार की कीमत

यह कहानी हमारे ही मोहल्ले की है, जहाँ एक परिवार रहता है। लॉकडाउन से पहले वे लोग बहुत खुश थे और हँसी-खुशी अपनी ज़िंदगी जी रहे थे। उनके घर में एक छह साल का छोटा बच्चा था, जो पूरे घर की जान था।

​जब लॉकडाउन लगा, तो सब कुछ बंद हो गया। उस समय वह बच्चा घर में बैठे-बैठे बहुत ज़्यादा मैदे से बनी चाऊमीन और मोमोज़ खाने लगा। हर रोज़ उसकी यही ज़िद रहती थी और घर वाले भी लाड़-प्यार में उसे खिला देते थे। लेकिन किसी को अंदाज़ा नहीं था कि यह बाहर का खाना अंदर ही अंदर उसे कितना नुकसान पहुँचा रहा है।


​एक रात अचानक उसके पेट में बहुत तेज़ दर्द उठा। वह दर्द से बुरी तरह तड़पने लगा। उसकी हालत देखकर परिवार के लोग घबरा गए और आधी रात को ही उसे अस्पताल लेकर भागे। वहाँ डॉक्टरों ने उसकी जाँच करने के बाद परिवार वालों से कहा, "इसके पेट में बहुत ज़्यादा इन्फेक्शन (संक्रमण) हो गया है, हमें इसका तुरंत ऑपरेशन करना होगा।"


​यह सुनकर घरवालों के होश उड़ गए। उन्होंने रोते हुए डॉक्टर से कहा, "डॉक्टर साहब, आप जल्दी से ऑपरेशन कर दीजिए। हमारे पास जितने पैसे हैं हम सब लगा देंगे, बस हमारे बच्चे को बचा लीजिए।" डॉक्टरों ने तुरंत उसका ऑपरेशन किया और उसे करीब एक हफ्ते तक अस्पताल में ही भर्ती रखा।


​एक हफ्ते बाद जब उसकी तबीयत थोड़ी ठीक हुई, तो डॉक्टरों ने उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी। सबने राहत की साँस ली कि बच्चा ठीक होकर घर आ गया। पर किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। उसी रात अचानक फिर से उसके पेट में बहुत तेज़ दर्द उठा। इस बार दर्द इतना भयानक था कि जब तक लोग कुछ समझ पाते या उसे दोबारा अस्पताल ले जाते, उसने दम तोड़ दिया।


​इस घटना के बाद उसके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। घर के सभी सदस्य फूट-फूटकर रोने लगे। लाड़-प्यार में केवल स्वाद के लिए कुछ भी खिलाते चले जाना आज उन्हें बहुत अखर रहा था। पर अब उनके पास अफसोस के सिवाय कुछ न बचा था। रोते-रोते उनके मुँह से बस यही निकल रहा था, "हमारा सब कुछ खत्म हो गया! हमारे सारे पैसे भी चले गए और हमारा बच्चा भी हमारे पास नहीं रहा।"



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