top of page

बहु चाहिए या बाई?

हमारे मोती नगर में दो परिवार रहते हैं—एक शर्मा जी का और दूसरा वर्मा जी का। इत्तफाक देखो कि आने वाले कुछ महीनों में दोनों ही घरों में शादियाँ थीं क्योंकि दोनों के बेटों का रिश्ता पक्का हो चुका था। लेकिन भाई, दोनों परिवारों की सोच में जमीन-आसमान का अंतर था।


शर्मा जी का बेटा है अमन, जो कि एक बिजनेसमैन है। शर्मा जी के घर वालों की पुरानी सोच थी कि बहू ऐसी आए जो चौका-बर्तन और घर का सारा काम संभाल ले, ताकि सास-ससुर को आराम मिले। अमन की तो अरेंज्ड मैरिज थी, तो जैसा घर वालों ने कहा, उसने हाँ कर दी।


दूसरी तरफ, वर्मा जी का बेटा है राहुल। राहुल सरकारी अस्पताल में रात के समय डॉक्टर की ड्यूटी करता था। वहीं काम करते-करते उसे नेहा नाम की एक लड़की से प्यार हो गया, जो खुद भी डॉक्टर थी। राहुल लव मैरिज करना चाहता था।


जब दोनों घरों में शादियाँ पक्की हो गईं, तो एक दिन दोनों की माताजी कॉलोनी के पार्क में मिलीं। शर्मा जी की पत्नी को थोड़ा घमंड था, वो वर्मा जी की पत्नी से बोलीं, "क्यों वर्मा जी, तुम तो बुढ़ापे में भी आराम नहीं कर पाओगी, तुम्हारी बहू तो डॉक्टर है, दिन-भर बाहर रहेगी। मेरी बहू को देखना, पूरा घर संभाल लेगी और मैं तो बस महारानी की तरह राज करूँगी।"


यह बात सुनकर वर्मा जी की पत्नी को बहुत बुरा लगा और गुस्सा भी आया। वह सीधे पैर पटकती हुई घर पहुँचीं और राहुल से बोलीं, "तू ये लव मैरिज नहीं करेगा। मैं तेरे लिए ऐसी लड़की लाऊंगी जो घर का काम करे और मुझे आराम दे!"

राहुल बहुत समझदार था। उसने माँ को सोफे पर बिठाया, पानी पिलाया और बड़े प्यार से समझाया, "माँ, जरा ठंडे दिमाग से सोचो। अगर घर में डॉक्टर बहू आएगी तो हमारी आर्थिक स्थिति कितनी अच्छी होगी। भगवान न करे कल को मुझे कुछ हो जाए, तो कम से कम घर में पैसों की तंगी तो नहीं होगी। और रही बात घर के काम की, तो उस काम के लिए हम नौकरानी रख लेंगे। कामवाली पैसों से मिल जाएगी माँ, लेकिन इतनी पढ़ी-लिखी और समझदार बहू नसीब से मिलती है।"

बेटे की ये बात मां के दिल में उतर गई। उनका गुस्सा शांत हो गया और फिर उन्होंने बड़ी धूमधाम से डॉक्टर बहू का स्वागत किया और उसे बहुत लाड़-प्यार से रखा।


कुछ महीनों बाद दोनों माताएं फिर उसी पार्क में मिलीं। शर्मा जी की पत्नी ने फिर से ताना मारते हुए पूछा, "और वर्मा जी, क्या हाल-चाल? घर का सारा काम खुद ही करना पड़ता होगा, तुम्हारी बहू तो डॉक्टर है ना?"

इस बार वर्मा जी की पत्नी ने मुस्कुराकर करारा जवाब दिया, "अरे नहीं शर्मा जी! मेरे बेटे ने तो घर के काम के लिए नौकरानी लगा दी है, मैं तो एक तिनका भी नहीं उठाती। और सुनो, अपनी सोच बदलो। कल को अगर मेरे घर पर कोई मुसीबत आती है, तो मेरी बहू पूरे घर को संभाल लेगी। तुम्हारी बहू क्या कर पाएगी? कल को खुदा न खास्ता कोई बात हो गई, तो तुम्हें लोगों के आगे हाथ फैलाना पड़ेगा, मुझे नहीं। अब बोलो, चुप क्यों हो गईं?"

यह सुनकर शर्मा जी की पत्नी का मुँह बिल्कुल बंद हो गया। वो चुपचाप नजरें झुकाकर पार्क से अपने घर की तरफ निकल गईं। और वर्मा जी की पत्नी खुशी-खुशी अपने घर आईं, जहाँ नौकरानी झाड़ू-पोछा कर रही थी और उन्होंने खुद प्यार से अपनी बहू और बेटे के लिए खाना बनाया।


सच बात है यार, बहू को घर की लक्ष्मी और ताकत समझना चाहिए, सिर्फ काम करने वाली बाई नहीं। (वैसे काम वाली बाई भी किसी घर की बहू होती है; वह भी अपने परिवार में बड़ा योगदान देती है। उसे भी समुचित सम्मान देना हम न भूलें।)

Recent Posts

See All
गधा

अपने 11 वर्ष की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते न जाने कई बार उसने लोगों के मुँह से अपने लिए ‘गधा’ संबोधन सुना होगा। ‘ओए गधे! सुनता नहीं है।’ ‘गधे! तुमसे नहीं होगा।’ ‘गधा कहीं का! तुझे इतनी सी बात समझ नहीं

 
 
 
नौवीं फेल

नौवीं कक्षा का मासूम बबलू एक नम्र निवेदन लेकर प्रिंसिपल ऑफिस में पहुँचा। बबलू ने कहा, “सर, मुझे स्कूल से मत निकालिए। मुझे NIOS (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग) में मत डालिए। मैं तीसरी बार फेल नहीं

 
 
 

Comments

Rated 0 out of 5 stars.
No ratings yet

Add a rating
bottom of page