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पी-पी वाला बाजा

यह कहानी मेरी और मेरी छोटी बहन की है, जब हम दोनों बहुत छोटे थे। उस वक्त मेरी उम्र करीब 6 साल थी और मेरी बहन सिर्फ 2 साल की थी। मेरी बहन को बचपन से ही अंधेरे से बहुत ज़्यादा डर लगता था, लेकिन बचपन की नादानी में हम इस डर की गहराई को नहीं समझते थे।

एक दिन दोपहर के समय हम दोनों घर में छुपन-छुपाई खेल रहे थे। सबसे पहले छुपने की बारी मेरी थी। हमारे घर में लकड़ी की छोटी-छोटी कई अलमारियां थीं, मैं फुर्ती से उनमें से एक के अंदर छुप गई। मेरी बहन ने अपनी नन्हीं आँखों से मुझे थोड़ी ही देर में ढूंढ लिया और खिलखिला कर हँस पड़ी।

अब मेरी बारी थी उसे ढूंढने की। अपनी दीदी की नकल करते हुए, वह भी उसी अलमारी का दरवाजा खोलकर अंदर छुप गई। मैंने उसे अंदर जाते हुए देख लिया था। बचपन की शरारत और नादानी में मैंने खेल-खेल में बाहर से उस अलमारी की कुंडी बंद कर दी।

लेकिन जैसे ही दरवाजा बंद हुआ, अंदर घने अंधेरे ने मेरी 2 साल की बहन को बुरी तरह डरा दिया। वह अंदर ही अंदर इतना सहम गई कि बिना रोए-चिल्लाए, डर के मारे अलमारी के भीतर ही बेहोश हो गई।

जब मैंने कुछ सेकंड बाद अलमारी का दरवाजा खोला, तो वह बेसुध पड़ी थी। उसके जिस्म में कोई हलचल नहीं थी। यह देखकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई और घर में कोहराम मच गया। हमारे घर के ठीक सामने ही एक अस्पताल था। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मेरे दादाजी (बाबा) ने तुरंत उसे अपनी गोद में उठाया और बिना वक्त गँवाए अस्पताल की तरफ भागे।


तभी रास्ते में एक चमत्कार हुआ...


अस्पताल के रास्ते में एक बारात जा रही थी, जिसमें बहुत ज़ोर-ज़ोर से बैंड-बाजा बज रहा था। उस तेज़ और धमक भरी आवाज़ को सुनते ही मेरी बहन के दिमाग को शायद एक झटका लगा और उसे अचानक होश आ गया! वह आँखें मटकाते हुए दादाजी को देखने लगी।

दादाजी उसे लेकर अस्पताल पहुँचे, लेकिन डॉक्टरों ने उसे पूरी तरह स्वस्थ पाकर तुरंत घर वापस भेज दिया।

जब बाबा उसे गोद में लेकर घर लौटे, तो मेरी अम्मा घबराते हुए दौड़कर आईं। उन्होंने पूछा, "क्या हुआ? डॉक्टर ने क्या बताया? हमारी बच्ची ठीक तो है ना?"

बाबा ने मुस्कुराते हुए कहा, "सब ठीक है। डॉक्टर ने कहा वो बिल्कुल भली-चंगी है। रास्ते में जब हम जा रहे थे, तो बारात के बैंड-बाजे की तेज़ आवाज़ सुनकर इसे रास्ते में ही होश आ गया था। इसलिए डॉक्टर ने कोई दवा नहीं दी और घर भेज दिया।"

यह सुनकर अम्मा ने राहत की सांस ली, लेकिन उनके मन में अपनी पोती की सुरक्षा को लेकर एक फिक्र थी। उन्होंने बाबा से कहा, "सुनो, अभी के अभी बाज़ार जाओ और एक ऐसा खिलौना लेकर आओ जो बहुत तेज़ आवाज़ करता हो। भगवान न करे, पर यदि कभी यह डर से बेहोश हुई, तो हम तुरंत वो खिलौना बजा देंगे ताकि इसे फौरन होश आ जाए।"

अम्मा चिंता को देखकर बाबा तुरंत बाज़ार गए और एक तेज़ आवाज़ करने वाला पी-पी बजाने वाला खिलौना ले आए। अम्मा ने उस खिलौने को घर के मंदिर के पास रख दिया।

सालों बीत गए, हम दोनों बहनें बड़ी हो गईं, और मेरी बहन का अंधेरे का डर भी खत्म हो गया। वह खिलौना कभी इस्तेमाल नहीं हुआ, लेकिन वह हमेशा हमारे घर में अम्मा के प्यार, बाबा की तत्परता और उस 'चमत्कारिक बारात' की याद दिलाता रहा, जिसने हमारी ज़िंदगी में खुशियाँ वापस लौटा दी थीं।

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