ठक-ठक
- Avinash Jha

- Jun 9
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Updated: Jun 10
शायद वह रविवार का दिन था। मैं भैया के साथ उनके दोस्तों से मिलने गया। जगह का नाम तो याद नहीं आ रहा। पर वह जगह थी दिल्ली में ही!
जब हम उनके कमरे के दरवाजे पर पहुँचे तो देखा वे कुछ दोस्त ज़मीन पर बैठे हुए अपने सामने रखी टीवी पर नज़रें गड़ाए हुए थे। चूँकि यह नब्बे के दशक की बात है तो उस समय के लोग जानते होंगे कि टीवी कैसा हुआ करता था…वही बक्से वाला! उस तरह के टीवी को CRT टीवी के नाम से आजकल के लोग गूगल पर सर्च करके जान सकते हैं। तो आखिर उस टीवी पर ऐसा क्या चल रहा था कि नज़रें उस पर गड़ी हुई थीं! तो भई दीवानगी भी कोई चीज होती है! वह भी एक दीवानगी थी क्रिकेट के प्रति।
खैर! वे एक-एक बॉल, एक-एक शॉट का मजा ले रहे थे। कुछ भी मिस नहीं करना चाहते थे। उनमें से एक के बगल में एक लंबा और पतला डंडा रखा हुआ था। आपने डंडे के उपयोग को लेकर कल्पना करनी शुरू कर ही दी होगी…जैसे, यह हो सकता है कि किसी को बीच में आने से रोकने के लिए रखा होगा। इसके अलावा भी आपने कुछ अनुमान लगाया हो ही सकता है। चलिए देखते हैं फिर क्या हुआ। वे मैच देखने में मशगूल थे। बीच-बीच में हूटिंग हो रही थी और तालियाँ भी बज रही थीं। उनमें कुछ क्रिकेट ज्ञानी बैट्समैन, बॉलर और फील्डर को उन तक न पहुँचने वाली सलाह भी दे दे रहे थे। कभी-कभी उनका हाथ अपने काल्पनिक बल्ले(बैट) को चौके-छक्के के लिए घुमा ही रहा था। तभी…टीवी झिलमिलाने लगा। आप झिलमिलाना समझ पाए न? नहीं! झिलमिलाना मतलब स्क्रीन पर दृश्य न आकर हर जगह चमकते हुए डॉट-डॉट दिखने लगे, वही जैसे बूंदी छाने जाते समय पूरी कड़ाही में बूंदी दिखती है। अब…
वह डंडा उठा… और टीवी के ऊपर ठक! स्क्रीन साफ, झिलमिलाते डॉट्स खत्म! क्रिकेट का आकर्षक दृश्य चालू! ऐसे में चेहरे खिल जाना एक सामान्य-सी घटना है। यह सब देख शायद मैं भी मुस्कुराया ही होऊंगा। अब तक रहस्यमयी बने रहे उस डंडे का इस्तेमाल जो समझ में आया था! सीखने-समझने का सुख ही कुछ और होता है! चेहरा खिल उठता है। फिर से सारी आँखें, सारे कान टीवी पर।
थोड़ी देर बाद फिर वही झिलमिलाना! तो उस डंडे का इस्तेमाल फिर हुआ। पर अबकी बार एक ‘ठक’ से काम न बना। दो-तीन बार करना पड़ा- ठक-ठक। पर बात बन गई! …और सब क्रिकेट देखने में जुट गए।
घटना बड़ी सीधी-सी लगती है। पर जब मैंने उस घटना का विश्लेषण किया और अपनी ज़िंदगी से जोड़कर देखा तो एक और बात पर मेरा विशेष ध्यान गया। तकनीकी नज़रिए से देखें तो आपको क्या लगता है, टीवी को ठोकने से वह ठीक क्यों हो जा रहा था? मेरा अनुमान कहता है कि ज़रूर कोई कनेक्शन हल्का ढीला रहा होगा जो टीवी के स्पीकर के वाइब्रेशन से या फिर किसी और कारण से धीरे-धीरे खिसकते-खिसकते अलग हो जा रहा होगा। इसलिए कभी एक बार में तो कभी अधिक बार ठोके जाने पर वह फिर से कनेक्ट हो जाता होगा और सिग्नल प्रोपर आने लग जाने से पिक्चर क्लियर दिखने लग जाती होगी। पर इसे ऐसे देखने पर मेरे मन में एक और सवाल पनपता है- इस तरह बार-बार टीवी को पीटने पर क्या वह लूज़ कनेक्शन पूरी तरह से ही टूट नहीं सकता था। (क्या पता आगे चलकर ऐसा हुआ भी हो!) यह भी तो हो सकता था कि टीवी का कोई और सर्किट या पार्ट ही टूट जाए या ख़राब हो जाए। ऐसी संभावना तो है न?
इस नज़रिए से देखें तो क्या टीवी के सिग्नल को ठीक करने के लिए उसे पीटना यानी उसे ठक-ठक करना उस समस्या का सही तथा टिकाऊ समाधान था? शायद मन ही मन आप कह रहे होंगे कि ऐसे हम काम चला तो लेते हैं, पर यह टिकाऊ समाधान तो नहीं! साथ ही यह किसी बड़ी गड़बड़ी को निमंत्रण देने जैसा भी है। तो फिर उस ख़राबी का उचित समाधान क्या होता? यही न कि यदि वे टीवी के पार्ट्स और उसके प्रोसेस को जानते हों तो उसे खोलकर उसे दुरुस्त कर लेते; यदि कहीं कोई सर्किट का तार कुछ लूज़ रहा हो या ठीक से नहीं जुड़ा हो तो उसे ठीक से जोड़ा जाता या आवश्यकता होने पर सोल्डरिंग की जाती! और यदि वे नहीं जानते तो किसी एक्सपर्ट यानी टीवी मैकेनिक के पास ले जाना उचित होता जो आवश्यक मरम्मत करता।
इस विश्लेषण के साथ ही मेरा ध्यान हमारे संबंधों में जीने की ओर गया। क्या वहाँ भी हम किसी की कमी को दूर करने के लिए ठक-ठक करने में तो नहीं लगे हुए हैं? वह चिल्लाकर किसी को चुप करा देना, किसी को डाँटकर अपने तरीके से चला लेना; यहाँ तक कि कई बार वहाँ भी थप्पड़ या डंडे से ठोककर ठीक करने का प्रयास करना, क्या यह सब कुछ वैसा ही नहीं है? क्या बच्चे, क्या बुजुर्ग और क्या बराबर वाले, क्या हम ऐसे ही इंसान को ठीक करने में नहीं लगे हुए हैं! क्या लगता है - क्या इससे इंसान में टिकाऊ परिवर्तन आ जाता है? क्या वह सही/अपेक्षित कार्य करना या सही/अपेक्षित तरीके से जीना सीख जाता है?
तो फिर चाहे मशीन हो या इंसान, उसे ठीक करने का सही तरीका क्या है? तरीके का पहला चरण तो मुझे यही समझ आता है कि पहले उसकी संरचना और क्रियाओं को जानना होगा। उसके बाद ही वह टिकाऊ तरीके से ठीक किया जा पाएगा। यदि मैं एक्सपर्ट हूँ तो मैं ठीक करने का प्रयास करूँ; यदि नहीं तो कम से कम सामयिक आराम (टेंपररी रिलीफ) के लिए मिसहैंडलिंग करके स्थिति और न बिगाडूं, उस कार्य में एक्सपर्ट की सहायता ले लूँ!
मेरा ध्यान जब ख़ुद पर जाता है तो स्पष्ट दिखता है कि कई बार शीघ्र रिजल्ट पाने के उद्देश्य से या फिर उसी तरीके को सही मानकर मैं भी ठक-ठक कर देता हूँ, और मामला बिगड़ जाने पर पछताता हूँ कि काश जल्दबाजी न दिखाई होती, मिसहैंडलिंग हो गई, मामला ज़्यादा बिगड़ गया! जैसे टीवी को सही तरीके से ठीक करने के लिए टीवी को जानना ज़रूरी है, वैसे ही मानव के सुधार के लिए मानव को ठीक से जानना आवश्यक है। मानव के भाव प्रधान होने यानी विश्वास, सम्मान, स्नेह आदि की चाहत के साथ होने को भूलना भारी पड़ जाता है। किसी बात की समझ बनने पर उसमें अपेक्षित स्थाई परिवर्तन संभव है, और वह भी स्नेहपूर्वक बताया जाना ही उसे स्वीकार्य होता है।
दंडात्मक तरीके से सुधार का प्रयास अंदर ही अंदर कुछ तोड़ रहा हो सकता है। एक मानव होने के कारण यह सच्चाई आपको स्वयं में भी दिख ही रही होगी! साथ ही, शायद आपको भी अपनी ज़िंदगी की ऐसी घटनाएँ याद आने लग गई होंगी जब आपने झकझोरकर, थपकी/थप्पड़ से या फिर जोर से ठक-ठक करके किसी वस्तु या व्यक्ति को ठीक करने की कोशिश की होगी। क्या सुधार टिक गया था?




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