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ज्ञानी जी

Updated: 5 days ago

मैं हमेशा से समझदार रहा हूँ। देखिए, आप मेरे समझदार होने के एहसास के इस सरल अभिव्यक्ति पर हँसिए मत! मैं अपनी समझदारी का पूरा प्रमाण रखूंगा।


अब यही बात लीजिए। मेरे बचपन में, परिवार और स्कूल में मुझे अनुकरण किए जाने की बात अन्य बच्चों को कही जाती थी। आखिर मैं समझदार था, तभी तो! आगे चलकर मैं शिक्षक बना। क्या यह अपने आप में समझदार होने का प्रमाण नहीं!... है न?


यदि आपको अभी भी मेरे समझदार होने पर शक़ है तो आगे की एक और बात बताता हूँ। वर्ष 2016 में, दिल्ली के सरकारी शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के अर्थ में शिक्षकों के नाम दिल्ली के शिक्षा-मंत्री जी का पत्र आया। वह पत्र एक आवाहन था उन शिक्षकों के लिए जो समाज में कुछ खास करना चाहते थे, जो विद्यालयों के शैक्षिक वातावरण को बेहतर बनाना चाहते थे। उस कार्य को करने वालों को मेंटर टीचर का दर्जा दिया जाने वाला था। उनका मुख्य कार्य शिक्षकों एवं विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करना था। एक निर्धारित प्रक्रिया से गुजरकर मैं भी उसमें चयनित हुआ। क्या यह मेरी समझदारी और योग्यता को सिद्ध नहीं करता? क्या मैं अपनी उपलब्धियों से आपको ज्ञानी नहीं लगता?


पर शिक्षा-मंत्री जी को शायद इससे भी ऊपर के स्तर का समझदार चाहिए था। हमें तरह-तरह की ट्रेनिंग दी जाने लगी। कुछ हमारे अपने शिक्षण विषय की, तो कुछ विद्यालय के शिक्षण व्यवस्था को दुरुस्त करने की, तो कुछ अपने जीने के समझ को बेहतर करने की, मानवीय मूल्यों की। वे ध्यान दिलाते- “जिसके पास जो होता है वह वही बाँटता है।” यदि हम समझदार होंगे तभी तो समझदारी बाँटेंगे! खुद को सुखपूर्वक जीना आता होगा तभी तो दूसरों को सुखपूर्वक जीना सीखाएंगे। नहीं तो अब तक इकट्ठी की गई मान्यताएँ और उन पर आधारित बैर, वैमनस्य एवं घृणा ही तो बाँटेंगे। तो क्या मैं समझदार नहीं था? क्या मैं अज्ञानी था? नहीं-नहीं! ऐसा थोड़े ही हो सकता है! यह तो समझदारी के स्तर की बात होती है। मुझे और मुझ जैसे अन्य मेंटर साथियों को समझदारी के और भी ऊँचे स्तर पर ले जाना था, तभी तो हम बेहतर मार्गदर्शन कर पाते। अतः ट्रेनिंग के क्रम में हमें 8 दिवसीय ‘जीवन विद्या शिविर’ करने का अवसर दिया गया। उसने अस्तित्व(existence) की सच्चाइयों को समझते हुए स्वयं के जीने के ढंग को ठीक करने की ओर ध्यानाकर्षण कराया। सच में… बहुत कुछ सीखने को मिला। मैं पहले भी क्या, क्यों, कैसे की बातें विज्ञान के संदर्भ में करना पसंद करता ही था, पर अब तो ज़िंदगी को भी वैसे ही देखने का प्रस्ताव आया था। ...शानदार! 


फिर, एक के बाद एक, अपनी समझ को पूर्ण करने के अर्थ में मैं कई शिविर में शामिल हुआ। मेरी जीवन यात्रा में एक बड़ा वैल्यू एडिशन। समझदारी के एक और ऊपरी पायदान पर मैं खड़ा था…


…एक चाहत पनपी- ‘मैं तो समझदार हूँ, पर यदि यह मेरी श्रीमती जी भी थोड़ी समझदार हो जातीं तो मेरा जीना आसान हो जाता; हमारे बीच प्रायः होने वाली खिट-खिट पिट-पिट बंद हो जाती और ज़िंदगी में सुकून होता। ज़िंदगी और खुशहाल होती। हर व्यक्ति हमेशा खुश रहना ही चाहता है… और इस मामले में मैं अलग तो था नहीं! मुझे भी हर पल ख़ुशी चाहिए थी।’ अब देखें तो… मेरी समझदारी के बावज़ूद जो मेरे हमेशा खुश रहने में रुकावट थी, वह थी श्रीमती जी का उतना समझदार न होना, या सीधे कहें तो नासमझ होना!


‘समाधान क्या था? ...उनका भी समझदार हो जाना! प्रश्न था- कैसे उनकी समझदारी पर काम किया जाए? मेरी तो सुनने से रहीं!’ जीवन विद्या शिविर से प्राप्त ज्ञान की चर्चा करता तो जवाब आता- “ये बातें किसे नहीं पता? क्या होगा यह सब सुनकर? इस सबसे कोई नहीं बदलता।” …और बात आगे बढ़ ही नहीं पाती। समस्या वहीं की वहीं। 'चाहे सबको वो बातें पता हों, पर जीने में दिखना भी तो ज़रूरी होता है! यदि वो बातें उन्हें भी पता है तो फिर उनके जीने में क्यों नहीं है?', यह विचार मन में आता। घर के मुद्दों पर कई बार वही खिट-खिट पिट-पिट। मैंने सोचा कि मैं तो उन्हें समझदार के रूप में स्वीकार नहीं हूँ, पर हो सकता है जीवन विद्या शिविर में किसी और से उन बातों को सुनकर थोड़ा फ़र्क पड़े! मैं अवसर के इंतजार में था। 


एक अवसर आया। उसी तरह का एक सामाजिक शिविर होने वाला था। मैंने श्रीमती जी के सामने प्रस्ताव रखा- “एक शिविर का आयोजन हो रहा है। आप चलेंगी क्या?” उनका जवाब आया- “क्यों जाऊँ? आपमें क्या बदला?” इस जवाब से मैं अंदर से तिलमिला गया, पर बाहर सहज बना रहा। ‘यह क्या कह रही हैं! मुझ में कुछ बदला नहीं?’ मैंने स्वयं को टटोला। ध्यान गया कि पहले वाला क्रोध अभी भी कभी-कभी उभर ही आता था। उस पर कई बातों में हमारे बीच विरोध का होना भी बना हुआ था ही। …और विचार के स्तर पर आए बदलाव को शायद वह देख नहीं पा रही थीं। खैर! अभी कुछ नहीं हो सकता था।


मुझे मुक्ति चाहिए थी…

नहीं-नहीं, श्रीमती जी से नहीं, बस खिट-पिट से! 


इसका रास्ता स्पष्ट दिखता था कि कोई उनकी समझ पर काम कर दे। अगले अवसर के इंतज़ार के अलावा कोई विकल्प नहीं था।


पल कैसे बीत जाते हैं इसका प्रायः पता ही नहीं चलता। शायद कुछ माह या साल भर बाद फिर एक अवसर आया। दिल्ली में एक त्रि-दिवसीय शिविर का आयोजन किया जा रहा था। मैंने फिर से प्रस्ताव रखा, “इस बार कहीं बाहर नहीं जाना है। दिल्ली में ही शिविर हो रहा है। क्या आप चलेंगी?” 


“क्यों जाऊँ? आपमें क्या बदला?” फिर से वही जवाब। …और मेरे लिए फिर से एक कचोट- 'क्या वास्तव में मुझमें कुछ भी नहीं बदला है?' खैर, मैं पहले दिन शिविर में अकेला ही गया। 


अगले दिन मेरा लगभग 10 वर्षीय बेटा साथ चल पड़ा। तीसरे दिन न जाने क्या हुआ, श्रीमती जी साथ चलने को तैयार हो गईं। उस दिन हम तीनों ने साथ में संबोधन और चर्चा सुनी। मैं खुश था कि कुछ तो समझदारी की बात अगले तक पहुँची होगी; सोच और व्यवहार में कुछ तो फ़र्क पड़ेगा!



इसके लगभग महीने भर बाद की घटना है। एक रात श्रीमती जी ने गर्म दूध का गिलास टेबल पर रखते हुए कहा, “पी लीजिएगा।” टेबल के पास ही बेड के एक ओर मैं खड़ा था। मैं उस ओर बढ़ा। श्रीमती जी बेड और टेबल के बीच की जगह से बाहर की ओर निकल रही थीं। तभी उनका हाथ गिलास में लगा। दूध टेबल पर गिरा और फैलते हुए टेबल के एक ओर रखी मेरी फाइल्स तक पहुँच गया। आपको क्या लगता है, यह देखकर इस ज्ञानी ने क्या किया होगा? आगे पढ़ने की जल्दबाजी मत कीजिए। जरा ठहरिए; आँखें बंद करके जरा सोचिए- इस ज्ञानी ने उस स्थिति में क्या किया होगा?


“ध्यान नहीं रख सकते थे? गिलास गिरा दी; दूध फैला दिया; मेरी फाइल्स ख़राब कर दी।” मेरे अंदर एक आवेश आया। मैं झल्लाकर और चिल्लाकर यह बोलने ही वाला था कि श्रीमती जी ने बड़ी मासूमियत से मुस्कुराते हुए मेरी ओर देखते हुए कहा, “मानव मूलतः ग़लती करना नहीं चाहता।” जैसे ही मैंने यह सुना, मेरा सारा उबाल ठंडा पड़ गया। मेरे चेहरे पर भी मुस्कुराहट आ गई। यह तो जीवन जीने के उन सूत्र वाक्यों में से एक था जिसे मैंने शिविरों में न जाने कितनी बार सुना, डायरी में सुंदर अक्षरों में नोट भी किया और अनेक चर्चाओं के दौरान सुनाया भी था। पर यह क्या? असल ज़िंदगी में तो ध्यान से उतर ही गया था। सच में इस बात में कितनी सच्चाई है! भला कोई जान बूझकर ग़लती करना चाहता है? यदि कोई जानता है तो ग़लती करता नहीं है। गलतियाँ तो हो जाती हैं। वह या तो समझ की कमी से होती है या कौशल की कमी से यानि अक्षमता से, या फिर ध्यान न दे पाने के कारण। 


मतलब, कमी चाहत में नहीं थी। अगले ने मेरा बुरा चाहते हुए वह कार्य नहीं किया था… और मेरी ज़ुबान पर आने वाले वाक्य सीधा अगले की चाहत को आरोपित करने वाले थे- 'गिरा दी... फैला दिया... ख़राब कर दी।' गड़बड़ी एक्शन (क्रिया) की थी और मैं आरोप इंटेंशन (इरादा/चाहत/उद्देश्य) पर लगाने वाला था। वह व्यक्ति जो मेरे स्वास्थ्य का खयाल रखते हुए दूध लेकर आया हो, क्या वह मेरी फाइल्स को ख़राब करने की चाहत के साथ था?


भला हो उस वाक्य का जो श्रीमती जी की ज़ुबान पर आया और भला हो इस बात का कि मेरे आवेशित वाक्य ज़ुबान पर आने से पहले थम गए। न तो… न जाने क्या क्या हुआ होता! मैं दो बातें सुनाता, शायद वो चार सुनातीं और उसके बाद...


तुम ऐसी...तो तुम ऐसे… तुम्हारे ऐसे…तो तुम्हारे वैसे… और हमारे इतिहास के पन्ने खुलने शुरू हो जाते ...और वह कहाँ थमता पता नहीं…


खैर… तो फिर हुआ क्या? बस इतना ही कि उन्होंने हँसते हुए टेबल पोछ दिया और मैंने मुस्कुराते हुए फाइल्स पोछकर सूखने के लिए रख दी। ध्यान गया कि दूध गिर जाने के बाद सुधारात्मक कदम इससे भिन्न भला क्या हो सकता था! पर, किसी गलती के होने और सुधारात्मक कदम उठाए जाने के बीच प्रायः जो होता है वह कितना निरर्थक होता है! ऐसा ही क्या हमारे बहुत सारे पारिवारिक तथा सामाजिक मामलों में नहीं होता? किसी ग़लती से घटना जब घट चुकी होती है, हम प्रायः एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप मढ़ने में उलझ जाते हैं। बीच में एक सरल उपाय कहीं छूट जाता है और हम मुस्कुराकर जीने की बजाय खिटपिट करते हुए एक-दूसरे को झेलते हैं।


उस दिन यह भी समझ आया कि अच्छी-अच्छी ज्ञानभरी बातें सुनने और डायरी में लिख भर लेने से व्यक्ति ज्ञानी नहीं हो जाता। मेरे ज्ञान के गुमान की हवा उस दिन निकल गई। वह समझदारी का ऊँचा पायदान भी कहीं गायब हो गया। उस दिन की घटना से एक और बात (जीने के सूत्र) पर ध्यान गया जो शिविर में कही जाती है- “मेरा आचरण ही मेरी समझ का प्रमाण है।” यानि मेरे ज्ञानी होने का प्रमाण कोई कोर्स कर लेना या सर्टिफिकेट हासिल कर लेना नहीं है, बल्कि मेरे जीने के तरीके से लोग मेरी समझदारी को स्वीकार करेंगे। साथ ही उस दिन की घटना ने एक और जीवन सूत्र स्पष्ट किया- “यदि व्यक्ति स्वीकार होता है तो उसकी बातें स्वीकार होती हैं।” …आखिर यह ज्ञानी क्यों नहीं सुना जा रहा था? 


“क्यों जाऊँ? आपमें क्या बदला?”, ये प्रश्न अब मेरी उन्नति के पथ प्रदर्शक हो गए हैं। यदि जीने में आया तभी मानो कि जाना है, समझा है। नहीं तो… खिटपिट चलेगा ही।


अभी भी इस स्वघोषित ज्ञानी जी के ज्ञानप्राप्ति की यात्रा जारी है। देखते हैं, कब ये ज्ञानी जी दूसरों को स्वीकार होते हैं!


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Aashiya Khatoon
5 days ago
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Bahut shandar

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