" जैसा आप मुनासिब समझे "
- Shivani Gupta
- Aug 27, 2020
- 1 min read
हैं जितना खिड़की से दिखता, बस जीती हूँ उतना सा
बस उतना ही धन मेरा हैं, मन से छू लेती हूँ जितना सा।
बिन मेरे मन के एक कहलाए, हैं कुछ एेसे रिश्ते से बंधे
फिर भी कठपुतली सी जान कहे "जैसा आप मुनासिब समझे"
सुख संग लिए सावन माह में जब ये धरा नहाती हैं,
फैले काजल के नयन मेरे बस र्दद के आँसू बहाती है।
अंधियारे मे रोशनी चंदा की हर चेहरे पर निखरी सी है,
सब कुछ होकर पास मेरे ना जाने ये जिंदगी बिखरी सी हैं।
शर्म से ये गाल नही, लाल छाप से हैं रंगे
फिर भी कठपुतली सी जान कहे "जैसा आप मुनासिब समझे"
डगमग पैरो से जूतो को खोलना हर रात मेरी मजबूरी,
बिन बोले 'देह' सौंप देना चाहे मन से हो कितनी भी दूरी।
कमरे से चौंके तक बस उतना जीवन मेरा हैं,
हैं नही जहाँ नीले निशान बस उतना तन मेरा हैं।
मदिरा का नशा चढ़ा के हर रात पूछे तेरे कितने बंदे,
फिर भी कठपुतली सी जान कहे "जैसा आप मुनासिब समझे "


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