जिन्दगी को हमने समझा ही नहीं है
- Shrawan Kumar Shukla
- May 14, 2020
- 2 min read
जिन्दगी इतनी कठिन भी नहीं है, इसे तो हमने बड़ी मेहनत से कठिन बनाया है । यह बात सही है कि जीने के लिए बहुत सारा सामान चाहिए पर क्या केवल सामान से जिन्दगी चल जायेगी? सामान का उपयोग भी हमेशा अकेले में नहीं होता है ज्यादातर सबंधों में होता है । अगर हमारे सम्बन्ध में तालमेल अर्थात सामंजस्य का अभाव है और गिला शिकवा शिकायत है तो कभी-कभी बड़े परिश्रम से जुटाए गए सामान भी काटने को दौड़ते हैं । ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सामान का उपयोग भी बहुत बार भाव (विश्वास, सम्मान इत्यादि) पाने के लिए किया जाता है अर्थात भाव पाने के लिए हम सामान का उपयोग करते हैं और दूसरों पर ही निर्भर रहते हैं ।

इससे तो ऐसा ही लगता है की हमने अपनी जिन्दगी के रिमोट का नियंत्रण दूसरों के हाथ में दिया हुआ है। दूसरे के गाड़ी, मकान और कपड़ों से प्रभावित होकर हमारी आवश्यकताओं का हमें पता चलता है और उसके लिए जोर लगा देते हैं । अपनी जिन्दगी का एक लंबा समय बीत जाता है फिर भी स्वयं की आवश्यकताओं को पहचानना भी हम सीख और समझ नहीं पाते हैं । ऐसे अधूरेपन के साथ कैसे जीना होगा? नहीं जी सकते, समझना ही पडेगा और कोई रास्ता नहीं है ।
क्या हमारे पास एक भी सम्बन्ध गिला शिकवा शिकायत मुक्त है ? जबकि हम चाहते है कि संबंधों में तृप्तिपूर्वक जीया जाए पर अभी ऐसी योग्यता बनी नहीं है । जितना भरोसा हमें पदार्थों पर है, वनस्पतियों पर है, जीव जंतुओं पर है इसके साथ ही अपने कौशल पर है क्या उतना भरोसा हमें सबंधों में भी है? शायद नहीं, क्योंकि हमने काम ही भौतिक जगत और कौशल विकसित करने पर किया है । सम्बन्ध पर उतना काम नहीं किया है जितना उसमें अपेक्षा है । सम्बन्ध में तो भाव की और भाव के निर्वाह की आवश्यकता होती है परन्तु हमने न तो भाव को समझने का प्रयास किया और न ही भाव के निर्वाह का अभ्यास किया । जिस क्षेत्र में प्रयास किया वहाँ पर उपलब्धि हुई और जिस क्षेत्र में प्रयास ही नहीं किया वहाँ पर उपलब्धि नहीं हुई । आज हमने सुविधा का संसार खड़ा कर लिया परन्तु सम्बन्धों का संसार नहीं खड़ा कर पाए । अगली पीढी को हम अविश्वाश के वातावरण में ही छोड़ने को मजबूर है ।

यह तो स्पष्ट हो ही गया है कि शारीरिक परिश्रम से सुविधाओं का संसार खड़ा किया जा सकता है पर संबंधों का संसार तो ध्यान देने से, समझने से ही खड़ा होगा अर्थात मन को लगाना होगा। मनुष्य तो समझ कर ही आराम में आता है । आगे की यात्रा में यदि हम सुविधा और सम्बन्ध दोनों के क्षेत्र में संतुलन बना सकें अर्थात कौशल और समझ दोनों का कार्यक्रम साथ में चला सके तो अगली पीढी पर बड़ा उपकार होगा ।


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