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ग्रैजुएट

Jun 1
2 min read

एक दिन घर में मेरी श्रीमती जी पूजा की तैयारी में लगी हुई थीं। उन्होंने बेडरूम के फर्श को धोकर साफ किया। मेरे लिए आदेश आया- “गैस सिलेंडर इस कमरे में लाकर पूजा वाले चूल्हे में जोड़ दीजिए।” मैंने आदेश का पालन किया। कोई जिरह नहीं किया। आस्था का सवाल था। विशेष साफ सफाई और पवित्रता का ध्यान रखते हुए यह व्यवस्था की जा रही थी। मैं रसोई घर में गया। वहाँ के चूल्हे से गैस सिलिंडर का पाइप अलग किया और बेडरूम के फर्श पर रखे पूजा वाले चूल्हे से उसे जोड़ दिया। 



श्रीमती जी ने कड़ाही चढ़ाई और पूजा के लिए भोग/प्रसाद तैयार करना शुरू किया। फिर किसी काम से वह उठकर बाहर गईं। मेरी नज़र चूल्हे पर गई तो देखा कि बर्नर के छेद के अलावा आसपास से फ्लेम निकलने लगा था। मुझे खतरे का एहसास हुआ। मैंने फटाफट फ्लेम बुझाने के लिए कदम बढ़ाया। मैंने क्या किया होगा? ऐसी स्थिति में सबसे पहले क्या किया जाना उचित होता है? 


(आप थोड़ी देर रुककर सोचें कि एक ग्रैजुएट जिसने बारहवीं तक विज्ञान की पढ़ाई भी की हो, उसने क्या किया होगा।) 


सोच लिया न? तो जानिए कि मैंने क्या किया। फटाफट चूल्हे के पास जाकर दाहिने हाथ से पाइप पकड़ी और बाएँ हाथ से गैस चूल्हा… और जोर लगाना शुरू किया कि पाइप अलग कर दूँ जिससे बर्नर तक गैस नहीं पहुँचेगी और आग बुझ जाएगी। आखिर मैंने विज्ञान में पढ़ा भी तो था कि किसी वस्तु को जलने के लिए तीन आवश्यक शर्तें होती हैं– पहली, वस्तु ज्वलनशील हो मतलब जलने वाला पदार्थ हो; दूसरी, ऑक्सीजन उस तक पहुँचे यानि उपलब्ध हो; और तीसरी शर्त यह कि ज्वलन ताप मिले यानि कम से कम वह तापमान जिसपर कोई वस्तु आग पकड़ लेती है। मेरा वैज्ञानिक दिमाग दौड़ा– जब सप्लाई ही बंद तो भला क्या जलेगा? आखिर लकड़ी के चूल्हों में भी तो हम ऐसा ही करते हैं। जब जलती हुई लकड़ी चूल्हे से बाहर की ओर खींच ली जाती है तो चूल्हे की आग कमजोर पड़ जाती है और खींचकर बाहर की गई लकड़ी भी कुछ देर में ठंडी होते हुए बुझ जाती है। 


तो…मैं चूल्हे से पाइप को अलग करने के लिए जोर लगा रहा था। ठीक कर रहा था न?


संयोग से तभी श्रीमती जी कमरे में लौटीं। जैसे ही उन्होंने मुझे यह करते देखा…

चिल्लाकर बोलीं, “यह क्या कर रहे हैं आप? रेगुलेटर बंद कीजिए! ऐसा लगा जैसे मैं होश में लौटा, फटाफट मैंने सिलिंडर से जुड़ा रेगुलेटर बंद किया। 


ध्यान गया कि मैं तो ईश्वर से सीधी मुलाक़ात तय करने वाला था! लकड़ी और गैस के गुण अलग होते हैं। पाइप खींचकर अलग करने पर तो पूरे घर में गैस फैल जाती और आग भयानक रूप ले लेती। और हो सकता था कि मैं श्रीमती जी के साथ ऊपरवाले के सामने खड़ा होता और वे मुस्कुराकर कह रहे होते– “और ग्रैजुएट मास्टर साहब…आपका स्वागत है!”


(पाठकगण, सावधान! कहीं आपकी ग्रेजुएशन भी मेरी जैसी तो नहीं है!)


(28/5/2026)

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