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यह पृष्ठ समर्पित है ऐसे लेखों एवं अन्य अभिव्यक्ति रूपों के लिए जो स्वयं एवं समस्त समाज में व्यवस्था की आशा में हमारे मन में सहज रूप में आते हैं। 

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यूँ ही विचारों का आदान प्रदान होते होते ज़िन्दगी को क्या पता किस क्षण कोई दिशा देने वाली बात मिल जाए जो न केवल अपना जीना सरल एवं सुखमय कर दे बल्कि दूसरों के जीवन के सुखी बनाने में स्वयं की भूमिका सुनिश्चित कर दे।

विकास की छाँव में...
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श्रवण कुमार शुक्ला
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कभी नेनुआ (तोरी) टाटी (छप्पर) पर चढ़ कर रसोई के दो महीने का इंतज़ाम कर देता था। कभी खपरैल की छत पर चढ़ी लौकी(घिया) महीना भर निकाल देती थी। कभी बैसाख में दाल और भतुआ (हरा पेठा) से बनाई सूखी कोहडौड़ी (मुंगौड़ी) सावन भादो की सब्जी का खर्चा निकाल देती थी‌।

 

वो दिन थे जब सब्जी पर खर्चे का पता तक नहीं चलता था। देशी टमाटर और मूली जाड़े के सीजन में भौकाल के साथ आते थे लेकिन खिचड़ी आते आते उनकी इज्जत घर जमाई जैसी हो जाती थी। तब जीडीपी का अंकगणितीय करिश्मा नहीं था। ये सब्जियाँ सर्वसुलभ और हर रसोई का हिस्सा थीं। लोहे की कढ़ाई में किसी के घर रसेदार सब्जी पके, तो गाँव के डीह बाबा तक महक जाती थी। शाम को रेडियो पे चौपाल और आकाशवाणी के सुलझे हुए समाचारों से दिन रुखसत लेता था। रातें बड़ी होती थीं। द्वार पे कोई पुरनिया (बुजुर्ग) आल्हा छेड़ देता था तो मानों कोई सिनेमा चल गया हो। किसान लोगो में कर्ज का फैशन नहीं था। फिर बच्चे बड़े होने लगे.. बच्चियाँ भी बड़ी होने लगी। बच्चे सरकारी नौकरी पाते ही अंग्रेजी इत्र लगाने लगे। बच्चियों के पापा सरकारी दामाद में नारायण का रूप देखने लगे। किसान क्रेडिट कार्ड...... ....डिमांड और ईगो का प्रसाद बन गया। इसी बीच मूँछ बेरोजगारी का सबब बनी।

 

अब दीवाने किसान अपनी बेटियों के लिए खेत बेचने के लिए तैयार थे। बेटी गाँव से रुखसत हुई.. पापा का कान पेरने वाला रेडियो साजन की टाटा स्काई वाली एलईडी के सामने फीका पड़ चुका था। अब आँगन में नेनुआ(तोरी) का बीज छीटकर मड़ई (छप्पर) पे उसकी लताएँ चढ़ाने वाली बिटिया पिया के ढाई बीएचके की बालकनी के गमले में क्रोटॉन लगाने लगी, और सब्जियाँ मंहँगी हो गईं।

 

बहुत पुरानी यादें ताज़ा हो गई। सच में उस समय सब्जी पर कुछ भी खर्च नहीं हो पाता था। जिसके पास नहीं होता उसका भी काम चल जाता था। दही मट्ठा का भरमार था। सबका काम चलता था। मटर, गन्ना, गुड सबके लिए इफरात रहता था।

 

सबसे बड़ी बात तो यह थी कि आपसी मनमुटाव रहते हुए भी अगाध प्रेम रहता था।

 

आज की क्षुद्र मानसिकता दूर दूर तक नहीं दिखाई देती थी।

 

हाय रे ऊँची शिक्षा कहाँ तक ले आई।

 

आज हर आदमी एक दूसरे को शंका की निगाह से देख रहा है।

विचारणीय है कि क्या सचमुच हम विकसित हुए हैं या यह केवल एक छलावा भर है!! 

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It is a social initiative by a group of Academicians.
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