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" गलतफहमी "

ना जाने क्यों जब गुजरती हूँ रोजाना उन नगरों से ,

सहम उठती हूं मैं उन ताकती हुई हजार नजरों से।


निकलते ही घर से सुनाई पड़ती है वह प्यारी सी चहचाहट,

साथ ही में सुनती हूं ओट के पीछे से वो दबी बड़बड़ाहट।


ना जाने क्यों इनका रोजाना ये किस्सा बन चुका है,

मेरी सुहानी सुबह का एक दुख भरा हिस्सा बन चुका है।


वो कदम जो रोजाना अपने सपनों को जोड़ने में लगे हुए थे,

लेकिन कुछ नजरें ऐसी थी जो उन हौसलों को तोड़ने में लगे हुए थे।


उस चहचाहट का मन बड़बड़ाहट में छुप जाना,

उन नजरों से बचते बचाते मेरी नजरों का जमीन पर झुक जाना।


आखिर क्यों लोगों ने बनाया रोजाना यह धंधा है,

मानो लगता है ऐसा कि आत्मविश्वास की उस टूटी डोर से बंधा है।


बस एहसास था इतना शायद किसी को मेरे देर आने से परेशानी है,

या फिर कहते होंगे इस पर तो किसी बाहर वाले की मेहरबानी है।


ना जाने क्यों मन में ख़लिशो का अंबार सा सज गया,

मेरे मन में उन सभी विचारधारा का कौतूहल सा मच गया।


सच या झूठ ,अच्छा हो या बुरा कुछ बातें ज्यादा दिनों तक नहीं रहती,

काश तारीफ बयां करती उन नजरों को घूरते हुए नकारात्मकता के साथ ना बहती।


समझा जिसे बड़बडा़हट असल में चहचाहट थी मुकम्मल राहों की,

शायद अकल पर ताला पड़ा था इसलिए अब तक कैदी थी घुटन भरी बाहों की।।


- शिवानी गुप्ता


 
 
 

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