कुरकुरे का मजा
- Himani
- Jun 5
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मैं तब छह साल की थी, जब मैं अपने गाँव उत्तराखंड घूमने गई थी। हम रात के समय गाँव पहुँचे। हम जैसे-जैसे घर के थोड़े-थोड़े पास जा रहे थे, वैसे-वैसे हमें घर के बाहर कोई खड़ा हुआ थोड़ा स्पष्ट दिखने लगा था। जब हम घर पहुँचे, तब पता चला कि वह कोई और नहीं, वह तो मेरी ताई जी थीं। फिर उन्होंने हमें तिलक लगाया और मम्मी को गले लगाया। फिर हम कमरे में कंबल ओढ़कर बैठ गए और हमने खूब बातें की।
अगले दिन मुझे मेरे भैया मिले। वे हमारे लिए कुरकुरे लाए थे। हमें कुरकुरे देते ही भैया बिस्तर पर लेट गए। मैंने और मेरे भाई ने कुरकुरे का पैकेट खोला। मैंने उसे कटोरी में रखा और हमने खाना शुरू किया। तभी मेरी आँखों में खुजली होने लगी। मुझे ध्यान नहीं रहा और मैंने उन्हीं मिर्च वाले हाथों से आँखें मसल ली। आँखें जलने लगीं। मैंने भैया को बताया, "मेरी आँखों में जलन हो रही है।" भैया ने कहा, "जाकर मुँह धो लो।" मैंने बताया कि मैं अपनी आँखें नहीं खोल पा रही हूँ, पर भैया उस समय उठे नहीं। पता नहीं, शायद थके रहे होंगे। फिर मैं आँखें बंद रखे हुए ही हाथ आगे बढ़ाते हुए मुँह धोने गई।
हमारा कमरा घर के पीछे वाली साइड में था, और कमरे के बाहर निकलते ही, कुछ कदम आगे चलकर नीचे खेत था। मैं डरते-डरते कदम रख रही थी कि कहीं अगले कदम में मैं खेत में न गिर जाऊँ! फिर वही हुआ, जिसका डर था, मैं खेत में गिर गई। मेरे सिर से बहुत खून निकलने लगा। मैं बहुत रोई। भैया दौड़ते हुए आए। उन्होंने मुझे उठाया। तभी मम्मी भी खेत से वापस आ गईं। मम्मी ने मेरी तुरंत मरहम पट्टी की।
मेरे सिर पर उस चोट का निशान बना हुआ है जो मुझे आज भी उस दिन के चटपटे कुरकुरे का मजा आँखों से लिया जाना याद दिलाता है।




अच्छी अभिव्यक्ति!