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एक ग़ुलाम ऐसा भी...

क्या ग़ुलामी किसी को पसंद है?

चलिए, दूसरों की छोड़िए...क्या आपको पसंद है?


इस प्रश्न का उत्तर आपके मन ने क्या दिया - हाँ या ना?


चलिए मैं अपनी बात बताता हूँ। मैं किसी की ग़ुलामी करूँ, यह मुझे पसंद नहीं। यदि किसी को ग़ुलामी करते देखता हूँ, यह भी मुझे नहीं भाता। जहाँ तक ग़ुलामी का अर्थ मुझे समझ आता है, वह है किसी और की मर्जी के हिसाब से कार्य करना। उस कार्य को किए जाने का निर्णय आपका नहीं, किसी और का होता है। आपकी प्राथमिकता में कोई और कार्य हो सकता है, पर आप विवश हो जाते हैं किसी और कार्य को करने के लिए। भला ऐसी स्थिति किसी को कैसे पसंद आए!


कुछ दिन पहले एक ऐसी ग़ुलामी की जंजीर की ओर मेरा ध्यान गया जो अनायास ही अधिकतर लोगों को जकड़ लेता है। ग़ुलामी भी ऐसी जहाँ ख़ुशी नज़र आती है। बहुत सारे लोग बड़ी खूबसूरती से इस खूबसूरत जंजीर का इस्तेमाल करते हैं। बड़ी मज़ेदार बात यह कि जिनसे जीवन की सही समझ बनाने हेतु सही मार्गदर्शन की चाहत होती है, वे भी कब हमें अपना ग़ुलाम बना लेते हैं, पता ही नहीं चलता!


एक दिन मेरा मन किया कि मेरा बेटा एक गाने की रिकॉर्डिंग करके यूट्यूब पर अपलोड करे। मैंने उसका ध्यान यूट्यूब पर उसे मिलने वाले व्यूज और लाइक्स पर दिलाया और उसे प्रेरित करने के लिए उसके गायन के कुछ पक्षों की प्रशंसा कर दी। फिर क्या था! जिस बच्चे को अभी गाने का मन नहीं कर रहा था, वह गाने के लिए तैयार था। मेरी चाहत पूरी हुई। पर क्या वह उसकी चाहत थी? क्या इस तरह उसका ध्यान संगीत के सुख को जीने की जगह प्रशंसा की गिनतियों पर नहीं चला गया होगा?


कई बार अभिभावक या शिक्षक यह कहते सुने जाते हैं -


देखो वह कितना अच्छा बच्चा है? या

अच्छे बच्चे कैसे? या

आप तो बहुत अच्छे हैं!


इन सबमें क्या आपको भी ग़ुलाम बनाने के प्रयास नज़र नहीं आते? किसने उन मानकों को तय किया जिसमें अच्छाई तौली जाती है? जब गहराई से देखता हूँ तो मानव की प्रशंसा पाने की चाहत ने उसे ग़ुलाम होने की ओर भी धकेल दिया।


सोचिए अपने फेसबुक, ट्विटर या यूट्यूब पोस्ट के बाद लाइक देखने की चाहत क्या ग़ुलामी नहीं!

जाँचिए कि जो बात आपने वहाँ रखी, वह आपके मन की कोई उद्देश्यपूर्ण सहज अभिव्यक्ति थी या लोगों की पसंद-नापसंद पर आधारित बात!


कई प्रश्न छोड़े जा रहा हूँ। आपके विचार जानने की चाहत है।


क्या प्रशंसा की चाहत रखना ग़लत है?

क्या हर प्रशंसा ग़ुलामी की दस्तक है?


 
 
 

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Punam Malawliya
Punam Malawliya
Aug 03, 2020

प्रशंसा की चाहत गलतहै?विचारने योग्य बात है। दरअसल सही गलत कुछ नहीं है,मेरे विचार से यह अपनी अपनी समझ पर निर्भर करता है। खुश होकर काम किया जाए तो प्रशंसा मिले न मिले कोई फर्क नहीं पड़ता।ऐसे में संतुष्टि मिलती है ,जिसके बाद कोई और चाहत शेष नहीं रहती। जिसकी अभी यह समझ नहीं बनी वे अभी प्रशंसा को ही सब-कुछ मिन बैठे हैं।उनके दृष्टिकोण , उनकी समझ से यह चाहत गलत नहीं है।रही बात दूसरे सवाल की तो ध्यान देने योग्य बात है कि प्रशंसा को किस रूप में लिया जा रहा है, प्रशंसा को यदि सहज ही पचा लिया तो प्रेरक बन सकती है। अन्यथा गुलाम बना सकती है।

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