top of page

एक फ्रेम, एक परिवार

Jun 13
3 min read

नौवीं के बच्चों ने ठान लिया था कि अपने सामाजिक विज्ञान के अध्यापक, A... सर को विदाई पर कुछ खास देंगे। सर अगले महीने ट्रांसफर हो रहे हैं। पूरी क्लास ने प्लान बनाया – सर की 3 साल 8 महीने की पुरानी फोटो इकट्ठी करके एक बड़ा फोटो फ्रेम बनवाया जाए।


S..... और M.... ने जिम्मेदारी ली। उन्होंने सर के पुराने छात्रों से और खुद A.... सर से फोटो मांगी और फोटो जुटाईं। 15 दिन की मेहनत से बहुत सुंदर फ्रेम बन गया। फ्रेम के बीच में लिखा था – "आप हमारे रास्ते के दीपक हैं, अ.... सर।"


पर AB.... को ऐतराज हुआ। उसका कहना था, "फ्रेम में मेरी फोटो क्यों नहीं लगाई? मैं भी तो सर को मानता हूँ।" S.... बोली, "तेरी फोटो धुंधली थी AB...., इसलिए नहीं लगाई।" बस, बात बढ़ गई। दोनों में खिटपिट हो गई। क्लास दो हिस्सों में बँट गई। कुछ M.... के साथ, कुछ AB.... के साथ।


बाकी बच्चों ने AB.... को समझाया, "देख AB...., बात फोटो की नहीं, भावना की है। S.... और M.... ने रात-रात भर जागकर ये काम किया । तू नाराज़ मत हो। फोटो फ्रेम में तेरी फोटो नहीं हैं, तो क्या हुआ? नाम तो हैं!" पर AB.... का गुस्सा शांत नहीं हुआ। उसने कह दिया, "मैं इस गिफ्ट में शामिल ही नहीं हूँ। तो मैं पैसे नहीं दूंगा! मेरे पैसे वापस कर दो!"


अगले दिन A.... सर को किसी तरह भनक लग गई। प्रार्थना के बाद सर क्लास में आए। उनके हाथ में कोई किताब नहीं थी। चेहरे पर मुस्कान थी।


सर बोले, "बच्चों, आज मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ। बहुत पुराने समय की बात है। एक गाँव में बड़ा अकाल पड़ा। गाँव के मुखिया ने कहा कि सब अपने घर से एक-एक मुट्ठी अनाज लाओ, एक बड़े बर्तन में डालेंगे और खिचड़ी बनेगी। सब लाए। एक बच्चा खाली हाथ आया। बोला, "मेरे घर में अनाज नहीं था, पर मैं पानी ले आया हूँ।" मुखिया हँसा, "बेटा, पानी से पेट नहीं भरता।" आग जलाकर खिचड़ी के लिए बर्तन चढ़ा दिया गया। थोड़ा ठहरकर उन्होंने उस बच्चे से कहा, "पानी थोड़ा कम पड़ रहा है। जो पानी लाए हो वह देना।" खिचड़ी बनी। सबके बीच बाँटी गई। सबका पेट भरा। क्या खिचड़ी में पानी का होना भी पेट भरने के लिए ज़रूरी नहीं है?


क्लास में सन्नाटा छा गया। सर ने आगे कहा, " *बच्चों, गिफ्ट फोटो का नहीं होता, नीयत का होता है* । AB.... का गुस्सा उसका पानी है। वो ये बता रहा है कि उसे भी सर से नफरत नहीं है और S.... और M.... की मेहनत उसमें पड़े चावल हैं। दोनों मिलेंगे, तभी खिचड़ी बनेगी।"


AB.... की आँख भर आई। वो खड़ा हुआ और S..... से बोला, "मुझे माफ कर दे S.... दीदी। मैं समझा नहीं।" S.... और M.... दोनों बोली, "हमें तुझे बताना चाहिए था।"


सर ने वो फ्रेम देखा। फिर जेब से एक छोटी फोटो निकाली और कहा, "ये जगह खाली रखना। ये फोटो मैं आज खिंचवाऊँगा – अपनी पूरी क्लास के साथ, क्योंकि असली फ्रेम आप लोग हो।"


उस दिन क्लास ने सीखा कि एकता मुट्ठी भर अनाज से नहीं, एक बूँद पानी की इज्जत करने से आती है। विदाई वाले दिन फ्रेम में सर बीच में थे, और चारों तरफ उनकी पूरी क्लास – सुरक्षा, मुमताज और बाकी 38 बच्चे। नीचे लिखा था – "सर, हम अलग-अलग फोटो थे, आपने हमें एक फ्रेम बना दिया।"



टीम में सबसे छोटा योगदान भी सबसे कीमती होता है। नाराज़गी की चट्टान हटते ही दोस्ती की गंगा बह निकलती है।

Recent Posts

See All
जलवा

मास्टर जी जैसे ही क्लास के सामने पहुँचे, वे अचंभित! उन्होंने जो देखा और जो महसूस किया उसका पूरा वर्णन शब्दों में समा पाएगा ऐसा लग नहीं रहा। यहाँ आपकी कल्पनाशक्ति ही आपके काम आएगी। खैर! कोशिश करता हूँ

 
 
 
गधा

अपने 11 वर्ष की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते न जाने कई बार उसने लोगों के मुँह से अपने लिए ‘गधा’ संबोधन सुना होगा। ‘ओए गधे! सुनता नहीं है।’ ‘गधे! तुमसे नहीं होगा।’ ‘गधा कहीं का! तुझे इतनी सी बात समझ नहीं

 
 
 
नौवीं फेल

नौवीं कक्षा का मासूम बबलू एक नम्र निवेदन लेकर प्रिंसिपल ऑफिस में पहुँचा। बबलू ने कहा, “सर, मुझे स्कूल से मत निकालिए। मुझे NIOS (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग) में मत डालिए। मैं तीसरी बार फेल नहीं

 
 
 

1 Comment

Rated 0 out of 5 stars.
No ratings yet

Add a rating
Rated 5 out of 5 stars.

अच्छी अभिव्यक्ति! अच्छा संदेश!

Like
bottom of page