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एक और कालिदास...

यह घटना तब की है जब हम उड़ीशा के कांसबहाल में रहा करते थे। पिताजी की वहाँ नौकरी थी और वहाँ हमें कंपनी का मकान मिला हुआ था। बहुत ही सुंदर कॉलोनी थी। मकान के साथ बागवानी के लिए जगह…साथ में एक बड़ा आंगन। वहाँ हरियाली भी खूब थी। रोड के दोनों ओर बड़े–बड़े छायादार पेड़ थे। उन दिनों हमारे घर में केरोसिन और लकड़ी का इस्तेमाल खाना पकाने के इंधन के रूप में होता था। वहाँ पास के गाँव के लोग जलावन की लकड़ी बेचने के लिए गट्ठर बाँधकर आया करते थे। आज भी यह बताते समय वह दृश्य जीवंत महसूस हो रहा है। पुरुष, कमर में लूंगी, गठा हुआ काला चमकता बदन और कंधे पर एक डंडे के दो छोर पर लम्बी–लम्बी काटी हुई लकड़ियों की गठरी। कभी स्त्रियाँ भी लकड़ी बेचने आतीं…सिर पर एक बोझा लिए। कीमत तो याद नहीं आ रही…पर कुछ मोल होता तो था ही!


एक दिन हमारे लिए मुफ्त लकड़ियों का इंतजाम हो रहा था… कंपनी की ओर से सड़क के दोनों किनारों के पेड़ों की नीचली टहनियाँ कटवाई जा रही थीं यानि छटाई चल रही थी। कॉलोनी में रहने वाले आसपास के परिवार वहाँ जमा हो गए थे, विशेषकर बच्चे और नौजवान। कुछ लोग कौतूहल में जमा हुए होंगे पर ज़्यादातर का उद्देश्य था कटी हुई टहनियाँ जलावन के लिए अपने घर ले जाना। वहाँ मैं भी पहुँचा हुआ था। मुझसे ठीक बड़े वाले भैया जिन्हें मैं ‘छोटे भैया’ पुकारता था, वे भी मुझसे थोड़ी दूरी पर थे. मेरी उम्र उस समय 9-10 साल रही होगी।


कंपनी के लोग पेड़ पर चढ़कर टहनियाँ काटने लगे। जिन पेड़ों की टहनियाँ काटी जा रही होती, लोग उनके इर्दगिर्द खड़े हो जाते। टहनी कटकर गिरती तो झट से कोई न कोई उसे पकड़ लेता। और ऐसे में जैसा सामान्य रूप से स्वीकार्य नियम होता है– जिसका हाथ पहले लगा, टहनी उसकी। मेरे सामने ही कई लोगों को कोई न कोई टहनी मिल गई थी और वे अपने घर की ओर ले जा रहे थे। भीड़ वहाँ बनी हुई थी। मैं छोटा–सा बच्चा सोच रहा था कि इन लोगों के बीच शायद मुझे तो कोई टहनी मिल ही नहीं पाएगी! कुछ तो करना होगा! क्या करूँ?...

तभी मन में एक विचार कौंधा। एक पेड़ की एक मोटी सी टहनी काटी जा रही थी। मैं उसके नीचे जाकर खड़ा हो गया। टहनी सीधे नीचे गिरेगी, और मेरे पकड़ते ही वह मेरी हो जाएगी। …और ऐसा ही हुआ। टहनी नीचे गिरी। मैंने उसे लपककर पकड़ा और खींचकर घर की ओर ले जाने लगा। तभी थोड़ी दूरी पर खड़े छोटे भैया ने जोर से कहा, “अरे अविनाश! तुम्हारे सिर से खून बह रहा है।” मैंने हाथ सिर पर लगाया। जैसे ही मैंने अपना हाथ देखा, मेरा रोना शुरू हो गया। हाथ खून से सन गया था। भैया और अन्य परिवार के लोग मुझे लेकर फटाफट घर पहुँचे। एक साफ कपड़े से सिर को दबाया गया और साइकल पर बिठाकर पास के डिस्पेंसरी में ले जाया गया। मुझे याद आता है कि सिर में कई टाँके लगे थे। टाँके लगाए जाते समय मैं एक स्टूल पर बैठा था और मेरा एक पैर घबराहट के मारे काफी उछल रहा था। खैर… मरहम पट्टी के बाद हम घर लौटे।


उस टहनी का क्या हुआ पता नहीं। पर दो बातें में मन में उठीं। पहली बात थी सिर के फटने के दूरगामी प्रभाव से जुड़ी। कुछ माह पहले या शायद पिछली क्लास में हमारे एक शिक्षक ने हमें कक्षा में एक सामान्य चर्चा के दौरान बताया था कि यदि सिर फटने पर हवा अंदर चली जाए तो व्यक्ति पागल हो सकता है। उस बात की याद आने पर मैं आशंकित हुआ कि कहीं हवा अंदर न चली गई हो और कहीं मैं पागल न हो जाऊँ। हालाँकि अब तक वैसे किसी पागलपन का संकेत तो स्वयं में नहीं दिखता…


और दूसरी बात…कालिदास जी की मूर्खता की कहानी तो आपने सुनी ही होगी…वही, जिसमें वे जिस टहनी पर बैठे थे उसी को काट रहे थे। वे महामूर्ख बाद में प्रकांड विद्वान बने। अपनी घटना मुझे कुछ वैसी ही लगती है– टहनी काटा जाना और स्वयं के नुकसान की स्थिति…वे टहनी के साथ गिरते और मैंने टहनी अपने ऊपर गिरा ली। मूर्खता तो कुछ वैसी ही लगती है, पर बुद्धिमान मैं हुआ या नहीं…यह तय होना बाकी है। अब जब भी मैं आईने में देखता हूँ तो सिर पर बाईं ओर ज़ख्म का अर्धचंद्राकार निशान उस घटना की याद दिला देता है। वह याद आते ही मेरे चेहरे पर हल्की मुस्कान फैल जाती है…एक और कालिदास!


अविनाश कुमार झा

(27/5/2026)

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4 Comments

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Deepa Bisht
Deepa Bisht
6 days ago
Rated 5 out of 5 stars.

Sir khani badi majedar he


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Avinash Jha
Avinash Jha
6 days ago
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धन्यवाद! आप भी अपनी कहानियाँ साझा करें। मुझे पढ़ना अच्छा लगेगा।

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Aashiya Khatoon
6 days ago
Rated 5 out of 5 stars.

Bahut badiya sir


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Avinash Jha
Avinash Jha
6 days ago
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धन्यवाद! एक लेखक आपमें भी है। उसके अभिव्यक्ति को पढ़ने की चाहत है।

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