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पिछले वर्ष गर्मी की छुट्टियों में मैं अपने परिवार के साथ एक मेले में गई थी। शाम का समय था। चारों ओर रंग-बिरंगी रोशनियाँ जगमगा रही थीं। बच्चे झूलों का आनंद ले रहे थे और दुकानों से खाने-पीने की चीज़ों की खुशबू आ रही थी। मेले का वातावरण बहुत उत्साहपूर्ण और आनंदमय था। मैं भी अपने माता-पिता के साथ मेले का आनंद ले रही थी।

तभी मेरी नज़र एक छोटी बच्ची पर पड़ी। वह एक कोने में खड़ी रो रही थी। उसके चेहरे पर डर और घबराहट साफ दिखाई दे रहा था। उसे देखकर मेरे मन में दया और चिंता का भाव उत्पन्न हुआ। मुझे ऐसा लगा जैसे वह किसी परेशानी में है। मैं दौड़कर उसके पास गई और उससे रोने का कारण पूछा। बच्ची ने रोते हुए बताया कि भीड़ में वह अपने माता-पिता से बिछड़ गई है। यह सुनकर मुझे उसकी चिंता हुई। मैंने उसे धैर्य बँधाया और कहा कि घबराने की आवश्यकता नहीं है। फिर मैं उसे लेकर मेले के सूचना केंद्र पर गई। वहाँ उपस्थित कर्मचारियों को पूरी बात बताई। बच्ची के बारे में घोषणा करवाई गई।
कुछ समय बाद बच्ची के माता-पिता वहाँ पहुँच गए। अपनी बेटी को सुरक्षित देखकर उनके चेहरे पर खुशी लौट आई। उनकी आँखों में खुशी के आँसू थे। उन्होंने मुझे धन्यवाद दिया और मेरी सहायता की सराहना की। बच्ची भी अब मुस्कुरा रही थी।
उस समय मेरे मन में बहुत संतोष और खुशी का अनुभव हुआ। मुझे लगा कि किसी जरूरतमंद की सहायता करना सबसे बड़ा पुण्य है। यह घटना मेरे जीवन की यादगार घटनाओं में से एक है।





आप जैसे बच्चों को अपनी ज़िंदगी को यूँ बयाँ करते देखना खुशी देता है।