फिर ऐसा क्यों?
- Avinash Jha

- 5 days ago
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एक नन्ही–सी बालिका के नयनों में थे अश्रु भरे।
और साथ में थे उसके न जाने कई प्रश्न खड़े।
करीब पहुँचकर मैंने पूछी उससे उसकी व्यथा।
नयन मेरे भी भर आए सुन उसकी करुण कथा।
पूछा उसने - हे गुरुवर यह अल्ट्रासाउंड क्या होता है?
मैंने भींच उसे अंकों में कहा - प्रश्न पूछने को कोई रोता है!
पर कॉंपते होठों ने उसके प्रश्न वही दोहराया।
आशंकित हो सिहर उठा मैं, और धीरे से बतलाया -
'यह है चमत्कार विज्ञान का, छुपी बात बताता है।
क्या है शरीर के भीतर, बाहर ही यह दिखलाता है।'
'पर यह कैसा चमत्कार हे गुरुवर जिसने मेरी बहन छीना!
मेरी माँ के अल्ट्रासाउंड ने कर दिया उसका मुश्किल जीना।
माँ के एक अल्ट्रासाउंड से घर में था हड़कंप मचा।
सबने अपने तर्क दिए, पर माँ से किसी ने न पूछा।
माँ ने जब विरोध किया तो दादी थीं उन पर भड़की।
कहा -
एक तो तूने पहले दी है, नहीं चाहिए अब लड़की।
अब वह न खाती है न सोती है, दिनभर बस वह रोती है।
मेरी प्यारी माँ के नयनों की जैसे बुझ गई ज्योति है।
जिस दादी की गोद में बैठ थी मैं खेला करती,
उसी गोद में कल मैं बैठी सहमी सी डरती डरती।
मैंने पूछा दादी से -
आप लड़की, माँ भी लड़की फिर लड़की क्यों नहीं चाहिए ?
ऐसा क्या लड़का करेगा, जो हम कर न सकें, बताईये।
एक पल वह अटकी झिझकीं, फिर संभलकर कहा-
आएगा एक प्यारा गुड्डा जिससे खेलेगी मेरी गुड़िया।
जान मेरी जब तुम दूजे घर चली जाओगी
कौन संभालेगा हमें जब तुम न आ पाओगी?
पर गुरुवर,
मैंने देखा है चाचा को, दादी को सताते हुए।
और देखा है बुआ को उन्हें उनसे बचाते हुए।
देखा है जायदाद के लिए उन्हें उनसे लड़ते हुए।
यहाँ तक कि लाठी ले उनकी ओर बढ़ते हुए।
फिर ऐसा क्यों?
कौन है मेरी बहन का क़ातिल, कौन है माँ का अपराधी?
यह विज्ञान दोषी है या है यह समाज की व्याधि?
मैं देखता रहा निरुत्तर, मुख से कुछ न कह पाया।
नन्ही–सी इस जान ने है कैसा यह प्रश्न उठाया?
क्या कोई उसे उस अपराधी से बचाएगा?
क्योंकि उसे डर है -
उस नन्ही बच्ची को डर है-
वह उसकी बेटी को भी उससे छीन ले जाएगा।
~ अविनाश कुमार झा


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