जलवा
मास्टर जी जैसे ही क्लास के सामने पहुँचे, वे अचंभित!
उन्होंने जो देखा और जो महसूस किया उसका पूरा वर्णन शब्दों में समा पाएगा ऐसा लग नहीं रहा। यहाँ आपकी कल्पनाशक्ति ही आपके काम आएगी। खैर! कोशिश करता हूँ आपकी कल्पना को आधार देने की। घटना बताता हूँ।
मास्टर जी वैसे तो रोज ही आकर्षक वस्त्र धारण करके तथा काला चश्मा लगाकर मदमस्त अंदाज़ में आया करते थे। पर वह दिन कुछ विशेष था। उनका चेहरा कुछ विशेष रूप से खिला हुआ था। सूट–बूट भी कुछ नया–सा लग रहा था। पर उनके चेहरे को और खिला देने का इंतज़ाम क्लास में आज होगा, इसका उन्हें उतना एहसास नहीं था। उतना एहसास नहीं था! मतलब? मतलब यह है कि थोड़ा अंदाजा तो था। उस क्लास के मॉनिटर, मोंटी ने क्लास व्हाट्सएप्प ग्रुप में पिछले दिन बच्चों को एक–एक दीया और थोड़े–थोड़े फूल, और कुछ सजावट के सामान आदि लाने का संदेश डाला था। यह तो उन्होंने पढ़ा था। पढ़कर उन्होंने उस संदेश पर कोई सवाल नहीं पूछा था। न ही कुछ कहा। भला वे ऐसा क्यों करते! बल्कि उस संदेश ने तो उनके अंदर खुशी की एक लहर–सी पैदा कर दी थी। बिना दिवाली के भी बच्चे इतनी तत्परता से अगले दिन कुछ विशेष करने की सोच रहे थे। रात भी उनकी जैसे–तैसे कटी थी। खयालों में जीना भी बड़ा कमाल का होता है। है न?
तो… जब वे क्लास के आगे पहुँचे , पाया कि क्लास के बाहर रंगोली सजी थी। उसके आसपास व्यवस्थित रूप में कुछ दीये सजे हुए जगमगा रहे थे। हालांकि दिन का समय था तो उनकी रोशनी शायद अच्छी तरह नहीं दिखती। तो बच्चों ने उसका इंतज़ाम भी कर रखा था। आखिर भक्त तो भक्त होते हैं। उन्होंने उस कॉरिडोर में तीन बेडशीट को पर्दे के रूप में लगाकर दिन में ही कुछ–कुछ रात जैसा इंतज़ाम कर दिया था। तो दीए जगमगा रहे थे। मास्टर जी का मन प्रफुल्ल हो उठा - ‘क्या बात है! ऐसा स्वागत! इन नालायकों को इतना कैसे सूझा?’ जैसे ही उन्होंने क्लास में कदम रखा, क्लास की दो बच्चियाँ जो बड़ी मुस्कुराती हुई द्वार घेरे खड़ी थीं, वे आगे आईं और उनका तिलक किया, अक्षत और पुष्पवर्षा की। फिर तो उन पर ऊपर से, दाएँ से, बाएँ से पुष्पवर्षा होने लगी। क्लास में जिस ओर भी नज़र जाती, फर्श पर, खिड़कियों पर, हर जगह दिए जगमगा रहे थे। उनकी झिलमिल लौ उनकी आँखों में जगमग–जगमग चमक रहीं थीं। वे अपने भाग्य पर आज खूब इतरा रहे थे। इतना मान सम्मान! उन्होंने सोचा भी न था।
जबसे उन्हें यह क्लास मिली उन्होंने मन से पढ़ाया ही कब था! ऐसा नहीं है कि उन्होंने पढ़ाने की कोशिश नहीं की। पर 5–7 पढ़ने वाले बच्चों द्वारा उनके शिक्षण की कमी निकाले जाने के बाद उन्होंने पढ़ाना काफी कम कर दिया। जो थोड़ा पढ़ाते भी हैं तो धुकधुकी लगी रहती है। दो दिन पहले ही तो रिया और जुनैद को तबीयत से डपटा था। उनकी यह मजाल कि क्लास में उनके न आने या देर से आने या फिर गलत पढ़ाने की शिकायत प्रिंसिपल से करे!
पर उस दिन?
'देखो, वे भी कैसे मुस्कुराते हुए उन पर पुष्पवर्षा कर रहे हैं!’
उन्होंने प्यार से उनका गाल खींचा। उनका ध्यान गया कि उस दिन के उनके चाटे की छाप अब तक जुनैद के गाल पर अंकित थी। वह देख वे थोड़ा सकुचाए, और फिर दाँत निपोरते हुए मुस्काए। प्रत्युत्तर में जुनैद ने भी मुँह बड़ा फाड़ते हुए अपनी चौबीसी दिखा डाली। चौबीसी समझ गए न? अरे अभी बत्तीसी आई कहाँ थी उसकी? जितनी होगी उतनी ही तो दिखा पाएगा!
मास्टर साहब दीनबंधु थे। उन्होंने हर दीन–दुखी का पूरा खयाल रखा था। उन्होंने अपने न पढ़ाने या ग़लत पढ़ाने का नुकसान बच्चों को कभी नहीं भुगतने दिया। कभी न अपने विषय में किसी को फेल होने दिया और न ही किसी दूसरे विषय में। सबसे काम निकालना उन्हें आता था। वह भी, यदि बात बच्चों की हो तो भला वे किसी से समझौता करने वालों में से थे! यूँ ही आज का दिन इतना विशेष थोड़े ही बना था!
वे न पढ़ने वालों के दिलों पर राज करते थे। …और जिन पढ़ने की चाहत वालों पर उनका सीधा राज नहीं था तो उनके लिए उनके चहेते थे न! बात इतनी ही नहीं थी! यह मत समझिएगा कि बहुत ज़्यादा कोई जोर जबरदस्ती का मामला था। वे समय–समय पर टॉफी, चॉकलेट, पेन, पेंसिल, और कई बार कोई स्पेशल गिफ्ट भी अपने बच्चों को बाँटा करते थे।
कभी भी उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाई के सामान की कमी नहीं महसूस होने दी। हालांकि इस साल के छह माह बीत जाने के बाद भी बच्चों को मिली वो कॉपी–किताबें बैग से निकलने पर नई–सी ही लगतीं थीं। अब तो उनके चाहने वाले बच्चों की संख्या बढ़ने लगी थी। जब भी किसी बच्चे ने पढ़ाई ठीक से न हो पाने के कारण फेल होने की चिंता जताई तो उन्होंने उन्हें गुरु मंत्र दिया था– ‘बोर्ड का पेपर बोर्ड पर। बिल्कुल चिंता मत करना।’ यह कहकर वे मुस्कुराया करते, और उनके पीछे–पीछे उनके विशेष शागिर्द कहकहे लगाते। वे भक्तिभाव से ओतप्रोत थे। भला हों क्यों न? उनकी कृपा ही तो थी कि खुद से चार पंक्तियाँ ठीक से न लिख पाने वाला मोंटी इस साल दसवीं की परीक्षा देने वाला था। इतना ही नहीं, अंशिका को तो हिंदी ठीक से पढ़ने में भी दिक्कत थी, पर वह भी दसवीं में पहुँच गई थी।
उनके द्वारा ‘गुरु मंत्र’ दिए जाने के बावज़ूद और कक्षा में फैले खिलखिलाहट के बीच भी जिनके चेहरों पर अपनी पढ़ाई को लेकर चिंता की कुछ लकीरें फिर भी बनी रहतीं, उनकी ओर मास्टर साहब या उनके बैग ढोने वाले, टिफिन लाने वाले, रजिस्टर लाने वाले आदि–आदि विशेष कृपा प्राप्त सेवकों की नज़र पड़ते ही वे भी अपने होंठ थोड़े फैलाकर मुस्कुराहट के रूप में अपनी अभिव्यक्ति दे दिया करते। बगैर इसके, उनका वर्तमान और भविष्य उन्हें और ख़राब नज़र आता। वैसे अब तो लगभग सभी ने दाँत सहित वाली खिलखिलाहट… असली वाली जैसी, ...दिखाना सीख लिया था क्योंकि उन्हें नकली मुस्कुराहट के एहसास होने पर भी खतरा था। वे शक़ के दायरे में आते थे।
बचे हुए 2–4, जिनका हृदय परिवर्तन वक़्त ले रहा था, उनकी पुष्पवर्षा ने आज उन्हें आश्वस्त कर दिया था कि अब उनके इस विद्यालय में बने रहने में कोई खतरा ही नहीं। पता नहीं क्या–क्या अनर्गल उन्होंने झेला था। पता नहीं कौन इन बच्चों के दिमाग में उल्टी–सीधी बातें भरता था जो उनकी शिकायत लेकर ये बच्चे प्रिंसिपल के पास या एजुकेशन ऑफिसर के पास पहुँच जाते थे। हालांकि उससे फ़र्क कोई ज़्यादा पड़ना नहीं था। उन्होंने अपना पूरा सिस्टम बना रखा था।
ओह! मैं भी आपको उनके बारे में क्या–क्या बताने लगा! तो आज के दिन को विशेष बनाने का श्रेय जाता था - मोंटी, प्रियांश, अंशिका और मेघा को। इन चारों ने ही योजना बनाई थी कि इस बार तो बोर्ड एग्जाम है, तो…
तो वे भूले नहीं थे…इस अवसर को…
उन्होंने इसे नाम दिया ‘कृतज्ञता दिवस’... अपने गुरुजी, हमारे उन्हीं मास्टर साहब के प्रति आभार व्यक्त करने का दिन।
तो जैसे ही कमरे में वे आगे बढ़े…
“हैप्पी बर्थडे टू यू… हैप्पी बर्थडे टू यू… हैप्पी बर्थडे डियर सर…”
क्लास में बच्चों की लयात्मक तालियों के साथ सुरीली आवाज़ ने मास्टर जी के कानों में मिश्री घोल दी। मोंटी और प्रियांश ने आगे बढ़कर उन्हें माला पहनाया। अंशिका और मेघा दीए वाली थाली लेकर आगे बढ़ीं और मास्टर साहब की आरती की।
बर्थडे विश के बाद कुछ बच्चों ने यह गाना शुरू किया–
“तुम्ही हो माता, पिता तुम्ही हो, तुम्ही हो बंधु, सखा तुम्ही हो…”
… और जो नहीं गा रहे थे उन्हें आँखों और केहुनियों के जोर पर गवाया जाने लगा।
पूरी क्लास भक्तिमय हो गई।
साथ ही बच्चे बारी–बारी उनकी चरणधूलि लेने लगे।
मास्टर साहब अभिभूत!
उन्हें पूरी गहराई से एहसास हुआ कि उनका जलवा किसी से कम नहीं!
पर अपने यादगार जन्मदिन के कुछ ही दिन बाद जब उन्होंने देखा कि पूरा देश किसी के लिए दीए जला रहा है तो उन्हें अपना जलवा छोटा लगने लगा।
मास्टर जी को अपनी योग्यता अब बड़े स्तर पर आजमाने की चाहत है। उन्होंने तय किया है कि वे और खादी एकाकार हो जाएंगे।



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