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कहीं आप मूड के शिकार तो नही??

आज मूड नहीं है, मूड ना खराब करो, इसी बात से मेरा मूड खराब हो जाता है, इसको देखते ही मेरा मूड खराब हो जाता है, देखा मूड खराब कर दिया ना, मेरा मूड नहीं कर रहा खाने को, गाने को, नहाने को, नाचने को आदि आदि।


क्या हम सभी मूड के शिकार हो गए हैं या शायद मूड खराब होना भी ‘स्टेटस सिंबल’ हो गया है? क्या है यह ‘मूड’ या हम नाटकीय हो गए हैं?


मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से मूड वह मानसिक अवस्था है जिसके अच्छे या बुरे होने पर मनुष्य के व्यवहार क्रिया और परिणाम में अंतर दिखाई देने लगे। मूड अच्छा हो तो मनुष्य अधिक सक्रिय, प्रफुल्लित, उत्साह और उमंग से भरा होता है और मूड खराब हो तो वह निष्क्रिय, निस्तेज, निराश, निरुत्साहित हो जाता है। खुशनुमा मूड ना सिर्फ जिंदगी के साथ हमारे क्रियाकलापों को आसान बना देता है, बल्कि दिनचर्या को भी रोचक और आनंदित कर देता है।


दरवाजे पर फल या सब्जी खरीदते समय मई- जून की विकराल गर्मी में बेचने वाले को एक गिलास ठंडा पानी पिला कर देखे, आपका मूड कितना हर्षित होगा। सिग्नल पर खड़े बच्चे को अपनी चॉकलेट में से आधी देकर देखिए, उसकी एक छोटी सी मुस्कान आपका मूड सातवे आसमान पर पहुंचा देगी। मेट्रो या बस में किसी जरूरतमंद को अपनी सीट ऑफर करके देखिए, आपका मूड ताजा हो जाता है। अपना पसंदीदा संगीत थोड़ी देर सुन कर देखिए, गाने के बोल गुनगुनाते रहे और हो सके तो धुन पर कुछ पल थिरक कर देखें। मूड भला चीज ही क्या है जो आपको विचलित कर सके। मूड को हवा हवाई कीजिए।

 
 
 

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