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ई कैसा विकास है

Updated: May 4, 2020

फागुन और चइत महीना के सब्जी का जुगाड़ तो लौकी के फुनगी (लता) को छप्पर पर चढ़ा कर अम्मा कर देती थीं। अषाढ़ में खपरैल की छत पर चढ़ी सरपुतिया (तोरी) से महीना भर निकल जाता था। और तो और बैसाख में दाल और भतुहा (हरा पेठा) से बनाई सूखी कोहडौरी (मुंगौड़ी) सावन भादो में सब्जी की कमी महशूस ही नहीं होने देती थी‌। सब्जी पर खर्चे का हिसाब तो कोई लगाता ही नहीं था क्योंकि इसका पता तक नहीं चलता था।

अपने यहाँ का टमाटर और मूली जाड़े के समय में अकड़ के साथ आते थे लेकिन खिचड़ी(मकर संक्रांति) आते आते उनकी अकड़ उतर जाती थी और कोई पूछता ही नहीं था। अब उनकी इज्जत घर जमाई जैसी हो जाती थी। ये सब्जियाँ हर घर में और चट्टी चौराहों पर लोकल खेतों से निकल कर आ जाती थीं और हर चौका(रसोई) का हिस्सा थीं। किसी के घर में जब लोहे की कड़ाही में रसेदार सब्जी पकती, तो गाँव के डीहबाबा और कालीमाई तक महक जाती थी। कोई जीडीपी की चर्चा थोड़े ही करता था शाम को रेडियो पर चौपाल और आकाशवाणी के सुलझे हुए समाचारों से सभी दिन को विदा करते थे। लोग देर तक जागते नहीं थे तो रातें बड़ी होती थीं। द्वार पे कोई पुरनिया (बुजुर्ग) बिरहा और निर्गुण छेड़ देता था तो मानों कोई सिनेमा चल गया हो।

किसानों में कर्ज का प्रचलन नहीं था भाईवादी से लोग मांग-चह के काम चला लेते थे। फसल होने पर लौटा आते थे। धीरे-धीरे बच्चे बड़े होने लगे.. ज़माना बदलने लागा। अब बच्चों का ज़माना दस्तक देने लगा था सरकारी नौकरी पाते ही सभी अंग्रेजी इत्र लगाने लगे। बिटियन के बाबूजी लोग सरकरिये नौकरी वाला दामाद खोजने लगे। सरकारी नौकरी करे वालों को बहुत बड़ा माने जाना लगा, भले चपरासी हो जा लेकिन सरकारी।

बुरा दिन शुरू हुआ जब सरकारी नौकरी के दीवाने होकर किसान अपनी बेटियों के लिए खेत बेचने के लिए तैयार हो गए। बेटी गाँव से बिदा हुई.. अब बाबूजी का फिलिप्स का रेडियो श्रीमान जी की टाटा स्काई वाली एलईडी के सामने फीका पड़ चुका था। अब आँगन में लौकी और नेनुआ(तोरी) का बीज छीटकर मड़ई (छप्पर) पर उसकी लताएँ चढ़ाने वाली बिटिया पिया के ढाई बीएचके की बालकनी के गमले में मनीप्लांट लगाने लगी यहीं से मनी यानी रुपयों का खेल शुरू हुआ सब्जियाँ पैसे से मिलने लगी और मंहँगी हो गईं।

सच में उस समय सब्जी बजट का हिसा नहीं थी इस पर कुछ भी खर्च नहीं हो पाता था। जिसके पास नहीं होता उसका भी काम चल जाता था।

सबसे बड़ी बात तो यह थी कि आपसी मनमुटाव रहते हुए भी लोग स्नेहपूर्वक जीते थे।

अब ये विकास हमें कहाँ तक ले कर आ गया। सभी एक दूसरे को शंका और सुबहा से देखते हैं विश्वास नाम की चीज़ तो गायब ही हो गयी है। विचार करिए कि क्या सचमुच मानव विकसित हुआ है या यह केवल कुछ सामान बना और बढ़ा लिया है!

 
 
 

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